आगरा, अजय दुबे। सांस थमने पर देह भले ही पार्थिव हो जाती हो मगर 'बंद आंखें' दो लोगों को रोशनी भी दे सकती हैं। जीते जी नेत्रदान करने की इंसानियत उनके दिवंगत होने के बाद औरों के लिए खुशियां ला रही है। बचपन में बीमारी के कारण मीरा के लिए बेरंग हुई दुनिया किसी के नेत्रदान से अब फिर से रोशन हो गई है।

भगवान टॉकीज के पास नगला पदी निवासी मीरा अंधेरी जिंदगी जी रही थीं। मीरा को बीमारी के कारण दस वर्ष की उम्र में आंखों में धुंधलापन दिखाई देने लगा। शादी के करीब दस साल बाद आंखों की रोशनी लगभग चली गई। एसएन में आंखों का चेकअप कराने पहुंचीं मीरा ने बताया कि चार बच्चे हैं, पति राम नारायण भी बीमार रहते हैं। आर्थिक तंगी के चलते मुश्किल होने लगी, 2016 में एसएन में दाएं तरफ की आंख में कॉर्निया ट्रांसप्लांट की, कुछ महीने बाद दिखाई देने लगा। अब घर में काम करती हूं, जिंदगी अच्छी कट रही है। मीरा की तरह एसएन में पिछले पांच सालों में 150 मरीजों में कॉर्निया प्रत्यारोपित हो चुकी हैं। ये बेहतर जिंदगी जी रहे हैं।

इस साल छह महीने में रिकॉर्ड नेत्रदान

एसएन मेडिकल कॉलेज में 2002 से आइ बैंक संचालित है, यहां हर साल 10 से 15 नेत्रदान (एक नेत्रदान से दो कॉर्निया मिलती हैं) हो रहे हैं। इस साल जनवरी से जून तक रिकॉर्ड 24 नेत्रदान हो चुके हैं। एक नेत्रदान से मिलने वाली दो कॉर्निया को अंधता से पीडि़त दो लोगों में प्रत्यारोपित किया जा रहा है। इस साल 44 मरीजों में कॉर्निया प्रत्यारोपित की जा चुकी हैं।

एसएन में पिछले पांच साल में हुआ नेत्रदान

2015 - 24 कॉर्निया

2016 - 29 कॉर्निया

2017 - 30 कॉर्निया

2018 - 30 कॉर्निया

2019 - 48 कॉर्निया

2002 से 2019 तक एसएन में नेत्रदान से मिली कॉर्निया - 341

एसएन में नेत्रदान के लिए मोबाइल नंबर पर करें संपर्क - 9639592894

संस्थाओं ने जगाई जागरूकता की अलख

नेत्रदान के लिए क्षेत्र बजाजा कमेटी और आगरा विकास मंच लोगों को जागरूक कर रहे हैं। इससे नेत्रदान करने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। ये संस्थाएं निधन के बाद नेत्रदान कराने के इच्छुक परिवारों की मदद कर रही हैं। एसएन के डॉक्टरों की टीम से संपर्क कर नेत्रदान कराया जा रहा है।

मृत्यु के छह घंटे तक हो सकता है नेत्रदान

मृत्यु के छह घंटे तक नेत्रदान कराया जा सकता है। इसके लिए निधन के बाद आंखों पर रुई गीली कर रख दें। पंखा बंद कर दें, जिससे कॉर्निया में नमी बनी रहे। सिर के नीचे तकिया लगा दें। नेत्रदान के लिए कॉर्निया निकाली जाती है, पूरी आंख नहीं निकाली जाती है।

भाई को रखा है जिंदगी के बाद भी जिंदा 

छह जून को भाई अमित लालवानी राजा की मंडी दुकान से घर लौट रहे थे, रास्ते में एक्सीडेंट से मौत हो गई। हमें लगा कि अब भाई तो नहीं रहा लेकिन उसकी आंखों से कोई और देख सकेगा, पड़ोसियों की मदद से एसएन में नेत्रदान करा दिया।

रितु लालवानी, झूलेलाल कॉलोनी, मारुति स्टेट

300 से अधिक मरीजों को है जरूरत

इस साल एसएन को 48 कॉर्निया नेत्रदान में मिल चुकी हैं, इन कॉर्निया से अंधता से पीडि़त मरीजों की आंख की रोशनी लौट सकेगी। 300 से अधिक मरीज हैं, जिन्हें कॉर्निया की जरूरत है।

डॉ. शेफाली मजूमदार, प्रभारी, नेत्र बैंक, एसएन मेडिकल कॉलेज

 

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Posted By: Tanu Gupta

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