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    क्या है फोन क्लोनिंग, जिससे WhatsApp सुरक्षा पर उठ रहे सवाल, जानिए इसका बॉलीवुड ड्रग्स मामले से कनेक्शन

    By Saurabh VermaEdited By:
    Updated: Fri, 25 Sep 2020 07:17 AM (IST)

    मोबाइल क्लोनिंग के सामने के आने के बाद से लोग WhatsApp सुरक्षा को लेकर सवाल कर रहे हैं। आलम यह है कि WhatsApp क्लोनिंग का मामला Twitter की टॉप ट्रेंडिंग लिस्ट में शामिल हो गया है। ऐसे में आइए जानते हैं कि आखिर मोबाइल क्लोनिंग क्या है?

    यह दैनिक जागरण की फाइल फोटो है।

    नई दिल्ली, टेक डेस्क. एक्टर सुशांत सिंह की मौत के बाद बॉलीवुड की दुनिया के कई राज खुल रहे हैं। इसी में से एक ड्रग्स का मामला है, जिसे लेकर बॉलीवुड के दिग्गज सितारों के खिलाफ जांच चल रही है। बॉलीवुड के इस ड्रग्स एंगल पर WhatsApp चैट के जरिए नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने पूछताछ के लिए दीपिका पादुकोण को समन जारी किया है। यह सारी चैट्स जाया साहा के फोन से रिसीव हुई है। ऐसे में संदेह जताया जा रहा है कि क्या इन चैट्स को मोबाइल फोन क्लोनिंग के जरिए हासिल किया गया है। 

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    WhatsApp सिक्योरिटी पर उठ रहे सवाल 

    मोबाइल क्लोनिंग के सामने के आने के बाद से लोग WhatsApp सुरक्षा होने को लेकर सवाल कर रहे हैं। आलम यह है कि WhatsApp क्लोनिंग का मामला Twitter की टॉप ट्रेंडिंग लिस्ट में शामिल हो गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर मोबाइल क्लोनिंग क्या है, जिसके जरिए किसी के मोबाइल से अहम जानकारी को बिना उसकी इजाजत से कॉपी की जा सकती है। 

    क्या है मोबाइल क्लोनिंग 

    यह एक ऐसी तकनीक है जिसके जरिए क्लोन किए जा रहे फोन के डेटा और सेलुलर पहचान को नए फोन में कॉपी किया जाता है। हालांकि व्यक्तिगत तौर पर फोन क्लोनिंग भारत में लीगल नही है। हालांकि अथॉरिटी कुछ खास मामलों में फारेंसिक रास्ते से होकर फोन क्लोनिंग करती हैं। इस प्रासेस में इंटरनेशनल मोबाइल इक्विपमेंट आइडेंटिटी (IMEI) नंबर के जरिए डाटा को एक्सेस किया जाता है। साधारण शब्दों में कहें, तो जब WhatsApp अकाउंट को एक डिवाइस से दूसरी डिवाइस में लॉग-इन करते हैं, तो यह एक तरह की क्लोनिंग ही होती है, जिससे जरिए डाटा को क्लाउड स्टोरेज से दूसरी डिवाइस में ट्रांसफर किया जाता है। 

    मोबाइल क्लोनिंग के लिए खास प्रोग्रामिंग स्किल्स की होती है जरूरत 

    फोन क्लोनिंग के लिए खास एक्सपर्ट की जरूरत होती है, जिनके पास प्रोग्रामिंग स्किल्स होती है। यह एक्सपर्ट कुछ ही मिनट में एक डिवाइस से दूसरी डिवाइस में पूरी आइडेंटिटी डाटा को ट्रांसफर कर देते हैं। मतलब एक डिवाइस को बिना टच करके डाटा को दूसरे मोबाइल में ट्रांसफर किया जा सकता है। भारत में मोबाइल क्लोनिंग का पहला मामला साल 2005 में दिल्ली में दर्ज किया गया था।