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रामराज्य सिर्फ राम के राजा बनने से नहीं आया था! रघुनंदन और भरत के इस त्याग में छिपा है इसका असली रहस्य

Published: Sun, 08 Nov 2026 09:30 AM (GMT+05:30)

रामराज्य केवल श्रीराम के राज्याभिषेक से नहीं आया था, बल्कि यह श्रीराम और भरत के त्याग और आचरण में छिपा ...और पढ़ें

रामराज्य का असली रहस्य क्या था? (Picture Credit- AI Generated)

रामराज्य का असली रहस्य क्या था? (Picture Credit- AI Generated)

आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण (अयोध्या)। प्रतिवर्ष कार्तिक अमावस्या पर दीपों से प्रकाशित होती है हर दहलीज-घर-आंगन; यह पर्व स्मृति है जब 14 वर्ष वनवास के बाद श्रीराम का हुआ था अयोध्या आगमन। धर्म का राज्य कैसे बना राजधर्म; क्या थे नागरिकों के उत्तम कर्म, आज दीवाली पर भारत की तरुणाई से बांट रहे हैं रामराज्य का वास्तविक मर्म...

उत्तर कोसल की विश्वविश्रुत राजधानी अयोध्या से एक युवक पैदल वन की ओर निकलने को है। भार्या और अनुज आग्रहपूर्वक साथ हो लिए हैं। रथ, घोड़े एवं हाथियों की सवारी करने को प्रशिक्षित और दुर्लभ भोगों में पले इनके चरण गंगा से गोदावरी तक कुश-कंटकों का परिचय प्राप्त करते हुए आगे बढ़ते हैं। वनवासी, गिरिवासी, कोल, भीलों तथा जनजातियों की दैनंदिन पीड़ाओं से एकमेक होते हुए, मुनि-महात्माओं के चिंतन-दर्शन तक पहुंचती इस तरुणाई ने अपनी आयु का एक दशक से अधिक समय बिताकर उत्तर से दक्षिण तक की भूमि को पांवों से नापा है। ये आखेटक नहीं हैं, न पर्यटक हैं, ये धरती के सबसे महान् राजवंश के उत्तराधिकारी हैं। युवा, शिक्षित, सुसंस्कृत, अपनी सीमाओं से परिचित और उनका विस्तार करने को संकल्पित।

ये वनयात्रा जैसे खोजने निकली है कि राजधानियां कहां चूकती हैं और अराजकता कैसे जन्म लेती है। अविश्वास क्या रूप धरता है और विश्वास कैसे स्थापित होता है। इनके पूर्वजों ने मनुष्यता के ऐसे प्रतिमान गढ़े हैं जो विश्वविख्यात हैं। तो, जब पुनः युवराज के अभिषेक का प्रसंग आया है तब यह प्रश्न जगा है कि यह केवल मुकुट बदलने का उत्सव है या कुछ और। फिर एक विलक्षण कथा सामने आयी है, विमाता के वचनों से अधीर हुए पिता का मान रखने को ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम ने वनयात्रा की है। उनकी भार्या विदेहजा सीता एवं अनुज श्रीलक्ष्मण श्रीराम के अनुयायी हुए हैं। प्रकटतया यह राजकुल में होने वाली एक दुर्घटना है, जिसका बहुत सारा आख्यान कथाओं में माता केकयी और दासी मन्थरा के बहाने प्रसिद्ध है। किन्तु, कुछ गहराई में उतरकर देखें तो स्पष्ट होगा कि यह रघुवंश में रामराज्य की प्रतिष्ठा का सूत्रपात है।

रामराज्य की भरत प्रतीक्षा

सत्ता निश्चित ही सिंहासनों से चलती है पर मानवता सुख-दुःख के साझे से सम्हलती है। श्रीराम उसी साझेपन को पहचानने-उसी सहकारिता को प्रतिष्ठित करने निकले हैं, जिसकी न्यूनता से लंका के राक्षस तपोवनों में उत्पात करते हैं और विश्वामित्र महर्षि रक्षा मांगने अयोध्या आते हैं। श्रीराम, जानकी एवं लक्ष्मण के रूप में भारत की युवा-चेतना राजकुल से निकलकर राज्य और प्रजा के समीकरणों को पुनः परिभाषित करती है। यहां से रामराज्य का महिमान्वित आकार निर्मित होता है और इस आकार की भूमि रचते हैं श्रीभरत। हमें पहचानना चाहिए कि रामराज्य की स्थापना भूगोल से कहीं अधिक भाव की भूमि में होती है। विधिक रूप से पाए हुए सिंहासन को वनवासी हुए अग्रज की धरोहर के रूप में सुरक्षित रखते हुए भरत जी ने 14 वर्ष जो तपःपूत प्रतीक्षा की है, वही मानो रामराज्य का पुण्याहवाचन है। यह कहना आवश्यक नहीं कि आयु की दृष्टि से चारों भाई प्रायः समान हैं और सभी में प्रजा का

स्नेह तथा विश्वास स्थापित है। तथापि अपने-अपने चरित्र को अपनी सहजता में जीते हुए श्रीराम और श्रीभरत परस्पर एक से बढ़कर एक दिखाई देते हैं। श्रीराम एवं श्रीभरत का यह चरित्र राजधानियों के रजोगुण को जैसे आग में तपाकर स्वर्ण की भांति शुद्ध कर देने का अनुष्ठान है। इस अनुष्ठान से हम बदलती हुई पीढ़ी की प्रगतिशीलता और अपने समय के प्रश्नों के श्रेष्ठतम उत्तर की खोज देख सकते हैं। पुरानी होती व्यवस्थाओं में से महानता को अंगीकार करके आगे ले जा सकने का विवेक इस कथा से प्रत्यक्ष होता है।

आचरणपरक है यह अवधारणा

रामराज्य कहकर हम जिस सुख-समृद्धि, सहकार-सामंजस्य तथा विकास का अनुभव करते हैं, वह केवल वस्तुपरक नहीं है अपितु वह आचरणपरक है। एक ओर श्रीराम अनैतिक हुए वाली को मारते हैं और सुग्रीव को दिया हुआ वचन प्रमाणित करते हैं तो दूसरी ओर श्रीभरत औषधि लेकर वायुमार्ग से अयोध्या पार करते श्रीहनुमान को अवरुद्ध कर देते हैं। यही वह संतुलन है, जो रामराज्य की अवधारणा को परिभाषित करता है। ऐसी शक्ति, सुरक्षा, सौमनस्य तथा सामंजस्य का सही अन्वय होने पर समृद्धि स्वतः सिद्ध हो जाती है। भारत का जीवन-मूल्य वस्तुतः इसके समाज-दर्शन में निहित नहीं है, यह आत्मदर्शन से परिभाषित होता है। व्यक्ति की आत्मनिष्ठा ही उसकी सामाजिक निष्ठा में प्रतिफलित होती है।
इसके विपरीत होने पर, जो तथाकथित सभ्यता सामने आती है, वह एक छद्म है, जो विश्व के अनेक क्षेत्रों में आज भी दृष्टिगोचर होती है। इस प्रकार समझने पर रामराज्य कोई ‘फैंटेसी’ नहीं रह जाता, यह चरित्र से घटित होने वाला एक साझा प्रयोग बन जाता है। इसी प्रयोग को भारत में श्रीरामकथा के आलोक में दुहराने का संकल्प पीढ़ियों से चला आ रहा है। कसौटी पर परखें स्वयं को वस्तुतः, राज्य को जिस प्रकार बल, वैभव तथा ऐश्वर्य में पहचानने का प्रचलित अभ्यास है, श्रीराम ने उसमें संशोधन किया। उत्तम शासन की पहचान यह कि कोई शासित है, यह अनुभव न रहे। जैसे ठीक से सोया हुआ व्यक्ति- मैं सो रहा हूं यह अनुभव नहीं करता, वैसे ही अच्छा राज्य किसी व्यवस्था के आग्रह से नहीं अपितु आस्था के अनुबंध से चलता है। रामराज्य इसका प्रमाण है परंतु जो आस्था से परिचित नहीं हैं, उन्हें अवश्य यह कथन विचलित कर सकता है।

हमारी सांस्कृतिक चेतना, हमारा सामाजिक मूल्यबोध हमें इस बात के लिए आमंत्रित करता है कि रामराज्य का अनुशीलन करते हुए
उसमें केवल श्रीराम नहीं अपितु स्वयं को खोजें। रामराज्य में निष्ठा रखने वाले यह तो जानते ही हैं वे उसके राजा नहीं हो सकते, ऐसे में स्वयं को रामराज्य के नागरिक के रूप में परखने का अभ्यास हमारी

निष्ठा का प्रमाण हो सकता है!

राजराज्य के निष्ठावान नागरिक रामराज्य का अर्थ है निरुपद्रव समाज, निरुपद्रव का अभिप्राय है विपरिणाम से रहित। वह वातावरण जहां व्यक्ति, वस्तु, वनस्पति से विचारपर्यंत कोई विरुद्ध परिणाम नहीं देता। लोग स्वधर्मनिष्ठ हैं। धर्मनिष्ठ होने पर भी स्वधर्मनिष्ठा प्रायः दुर्लभ है। स्वधर्मशील समाज में जीवन सहज हो जाता है। बहुत पेचीदगी और दुविधाएं नहीं रहतीं, क्योंकि किसी का भी आकस्मिकता से अधिक प्रयोजन नहीं रह जाता। इस परिस्थिति में उदारता तथा परस्पर सद्भाव की स्वतः सिद्धि होती जाती है। इसका अर्थ यह भी नहीं कि फिर कहीं कुछ भी गड़बड़ नहीं हो सकती परंतु, तब एक की चूक सबको नहीं गिरा
पाती। कोई कहीं चूकता है तो दूसरे अपने-अपने अंश में सम्हाल लेते हैं और इस प्रकार बड़ा आघात भी लघुतर हानि में बीत जाता है। लोकभिराम श्रीराम मैं रामराज्य पर बात करते हुए सदा यह अपेक्षा करता हूं कि इसे किसी सिंहासन की छाया भर में न समझा जाए। रामराज्य श्रीराम के लोकाभिराम होने में निहित है। महर्षि वाल्मीकि कहते हैं कि रामराज्य में सारा जगत् राममय हो गया। उस राममयता का स्वरूप क्या था, यह बताते हुए उन्होंने कहा कि ‘प्रजानामभवत्कथा:’ अर्थात् सारी प्रजा श्रीराम की चर्चा करती थी। यह लोकस्वीकार राजा और प्रजा को एक ऐसे सौजन्य से भर देता है जो पूरी प्रकृति को अनुकूल बना दे।

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