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घर की चौखट पर क्यों बनाया जाता है स्वस्तिक? जानें इसकी चार भुजाओं का खास अर्थ

Published: Sat, 07 Nov 2026 11:03 PM (IST)

मोरारी बापू स्वस्तिक के महत्व को बताते हुए कहते हैं कि यह कल्याण, मंगल और शुभता का प्रतीक है, जो ...और पढ़ें

मोरारी बापू का संदेश स्वस्तिक का अर्थ सनातन धर्म और जीवन में इसका महत्व

मोरारी बापू का संदेश स्वस्तिक का अर्थ सनातन धर्म और जीवन में इसका महत्व

मोरारी बापू, कथावाचक। हम कई स्थानों पर घरों और दुकानों के बाहर चौखट के ऊपर स्वस्तिक बना देखते हैं। स्वस्तिक शब्द स्वस्ति से बना है, जिसका अर्थ कल्याण, मंगल, शुभता है। यह प्रतीक सदियों से भारत के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा है। स्वस्तिक के आसपास शुभ-लाभ, ये दो शब्द हमें संकेत करते हैं कि प्रत्येक लाभ शुभ हो, यह आवश्यक नहीं है, लेकिन प्रत्येक शुभ लाभकारी ही है। यानी जहां शुभ है, वहां लाभ होगा ही होगा।

इसलिए सनातनी परंपरा में लाभ से पहले शुभ की कामना की गई है। सबका शुभ हो, सबका मंगल हो, सबका कल्याण हो, यह सनातनी परंपराओं का मूल है। इसी कामना के साथ हम स्वस्तिक यात्रा कर रहे हैं। आदि शंकराचार्य ने सनातन धर्म की भावना के साथ पूरे भारत में भ्रमण कर देश के विभिन्न हिस्सों को एक सूत्र में जोड़ने का कार्य किया था। भारत की चारों दिशाएं अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि एक ही भारत की अभिन्न अंग हैं। स्वस्तिक की चार भुजाएं इसी व्यापक एकता और राष्ट्रीय एकीकरण के उद्देश्य की याद दिलाती हैं। सनातन धर्म एक शाश्वत प्रवाह है, जो सदैव विद्यमान था, आज भी है और सदैव बना रहेगा।

सनातन कहता है कि जीवन में वाह-वाह के साथ स्वाह की भावना भी होनी चाहिए। स्वाह यानी त्याग और समर्पण। ऐसे काम करने की सभी लोगों की इच्छा रहती है, जिससे उन्हें वाहवाही मिले। इसमें कोई हानि नहीं है, लेकिन व्यक्ति में त्याग की भावना भी होनी चाहिए। राम ने भरत के लिए राज छोड़ा तो भरत ने राम के लिए त्याग किया। त्याग और समर्पण की शुरुआत परिवार से होनी चाहिए। परिवार के सदस्यों में एक-दूसरे के प्रति त्याग और समर्पण की भावना का होना परिवार का स्वस्तिक है।

सनातनी त्योहारों और तीर्थों के साथ जुड़ी घटनाओं से शिक्षा लेनी चाहिए। युवा पीढ़ी तक सनातन का दर्शन पहुंचे, इसके लिए आवश्यक है कि सभी विद्यालयों में सनातन का इतिहास पढ़ाया जाए। परिस्थितिवश जो लोग सनातन को छोड़कर चले गए थे, अब वे अपनी घर वापसी करें। अपने मूल में लौट आएं। युवाओं से अनुरोध है कि सनातन की व्यापकता को समझने के लिए जब भी समय मिले, ग्रंथों का अध्ययन करें। नेट पर सभी ग्रंथ उपलब्ध हैं। जब भी समय मिले, किसी ग्रंथ को खोल लें। मैं तो श्रीरामचरितमानस की पोथी लेकर पूरी दुनिया में घूम रहा हूं। स्वस्तिक यात्रा में भी यह साथ है।

हमारा जीवन स्वस्तिक कैसे बने, इस पर मनन होना चाहिए। जो भी रुकावटें हैं, उन्हें दूर करने के प्रयास होने चाहिए। मानस में राम कहते हैं- "निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा"। राम कह रहे हैं कि छल-कपट से रहित और निर्मल, पवित्र मन वाला उन्हें प्राप्त कर सकता है। उन्हें कपट, छल और दूसरों के दोष या कमियां यानी निंदा, इर्ष्या वाले नहीं भाते। ये निंदा, ईर्ष्या, छल कपट, संशय ही जीवन में स्वस्तिक को अंकित नहीं होने देते।


हमारा अभिमान भी एक रुकावट है। अभिमान वह है, जब किसी व्यक्ति के पास कोई योग्यता, ज्ञान या संपत्ति हो और उसके कारण उसमें श्रेष्ठताबोध आ जाए। यह भी उचित नहीं है। यह कुछ हद तक ठीक भी है, लेकिन दूसरा मिथ्याभिमान तो बहुत खराब बात है यानी उसके पास कुछ नहीं है, फिर भी अभिमान करे। तीसरा है स्वाभिमान। इसे गौरवबोध और अस्मिता भी कह सकते है। चौथा है निरभिमान, जो सर्वश्रेष्ठ है। सच्ची महानता विनम्रता में निहित है, इसलिए निरभिमान श्रेष्ठ है। चैतन्य ने कहा है कि घास की तरह हो जाओ। आंधी आई तो झुक गए। यह अवस्था हमें स्वस्तिक के निकट लाती है। ईश्वर की कृपा किसी भी रूप में प्राप्त हो, धन संपदा, प्रसिद्धि बढ़े तो अभिमान नहीं, विनम्रता बढ़नी चाहिए। सबके लिए प्रेम और करुणा का भाव होना चाहिए।

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