कौन थे युग तुलसी श्रीरामकिंकर जी? जिनकी रामकथा सुनने संत भी खिंचे चले आते थे
अपने संपूर्ण कर्तृत्व को गोस्वामी तुलसीदास जी को अर्पित कर स्वयं को धन्य मानने वाले गुरुदेव श्रीरामकिंकर जी महाराज अपनी ...और पढ़ें
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युग तुलसी श्रीरामकिंकर जी महाराज: जिनकी रामकथा में संत भी पाते थे समाधि सुख
स्वामी मैथिलीशरण, (संस्थापक-अध्यक्ष, श्रीरामकिंकर मिशन)। चित्रकूट जिनका तीर्थ, श्रीराम जिनके आराध्य तथा हनुमान जी जिनके जन्म-हेतु हैं, ऐसे पूज्य श्रीरामकिंकर जी मुख से, नेत्रों से और रोम-रोम से प्रवचन करते थे। वे विगत से कभी निराश नहीं हुए, वर्तमान से स्पर्धा नहीं की और भविष्य की कोई कल्पना या इच्छा भी नहीं की। संपूर्ण संतुष्ट जीवन। मानस की ऐसी व्याख्या, जैसे कोई त्रेतायुग की कमेंट्री कर रहा हो। युग तुलसी श्रीरामकिंकर जी महाराज को विद्यार्थी, शोधार्थी, अर्थार्थी ज्ञानी और जिज्ञासु, सब अपनी-अपनी दृष्टि से देख-सुनकर सुख लेते थे।
उनके प्रवचनों में प्रतीकवाद का आधारस्तंभ गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित उनका अंतिम ग्रंथ विनय पत्रिका था। मोह, अहंकार, लोभ, काम, महत्वाकांक्षा के प्रतीकों को श्रीरामचरितमानस के पात्रों और कथा के घटनाक्रमों में पिरोकर प्रवचन कथन को कुछ ऐसा बनाया कि मंच के मुख्य पर्दे पर श्रीरामकिंकर प्रवचन माला के रूप में लिखा जाता था। लोगों के लिए रामकिंकर नाम ही पर्याप्त होता था। उनके प्रवचनों में पात्र, संदर्भ, कोई एक चौपाई या किसी संवाद को विषय बनाया जाता था, सात या नौ दिन तक नित्य उसी की मीमांसा होती थी।
मौन रहकर बोलना उनका अपना वैशिष्ट्य था। समाज की किसी भी वर्तमान घटना पर क्रिया-प्रतिक्रिया करके वे कभी किसी लोकप्रियता की इच्छा के शिकार नहीं हुए। उनके प्रवचनों में न दल थे, ना दलदल थी। केवट प्रसंग पर बोलने के लिए गंगा तट पर भगवान श्रीराम और केवट के बीच एक संक्षिप्त संवाद, लक्ष्मण जी और श्रीसीता का खड़े रहकर उसको सुनना और गंगा जी को केवट के व्यवहार पर चिंतित होना। बस, इतने से वाक्यों से नौ दिनों में वेद-पुराणों के मर्म को निचोड़कर अमृतपेय तैयार करके श्रोताओं को पिला देते थे। श्रीरामचरितमानस का कोई भी प्रसंग या चौपाई क्यों न हो, वे प्रारंभ के पांच मिनट तक गंभीर स्वर में आत्मभाव में स्थित होकर नाभिस्वर से संदर्भ को ही केंद्र बनाकर श्रोताओं को कब विदेह बना देते थे, यह न उन्हें पता था और ना ही श्रोताओं को, क्योंकि दोनों ही अपने में नहीं रहते थे।
जो प्राप्त है, वे उसी को भगवान का कृपा प्रसाद तथा साधन चतुष्टय मानते थे। वे व्यक्ति के चित्त का हरण करने के लिए कोई जादू-टोना न करके मात्र अपने शील स्वभाव और अनपेक्षित जीवन शैली के द्वारा ही अपनी विशुद्ध निर्लिप्तता से ही भक्तों में छा जाते थे और हृदय में प्रवेश कर जाते थे। हम जो भी उनके नाम, यश या चिंतन प्रचार के लिए करते दिखाई दे रहे हैं, वह उनकी इच्छा कदापि नहीं थी। उसे तो हम अपनी धन्यता के लिए कर रहे हैं।
अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष, जागृति, स्वप्न, सुशुप्ति और तुरीय अवस्था, श्रीराम का जन्म, रामराज, राम का वनगमन, भरत, लक्ष्मण, हनुमानजी, शबरी, गीधराज, विभीषण शरणागति, धर्मसार, धर्मरथ, प्रेममूर्ति भरत जैसे प्रसंगों पर जब वे प्रवचन करते थे, तब श्रोताओं को लगता था कि वे आंखों देखा हाल सुना रहे हैं। वे लोकैष्णा और प्रतिस्पर्धा के बोतल में बंद भूत को कभी बाहर नहीं निकलने देते थे। ठाकुर जी और ठाकुर जी की कृपा यही दो शब्द उनके कर्णधार थे। वे देने में भी उतने संकोची थे, जितने लेने में, किंतु जो है उसे सहजता से स्वीकार करना उनके जीवन और मुखमंडल पर आनंद का कारण था। संसार के सभी संतों के प्रति अनंत श्रद्धा और सबकी प्रशंसा कहकर और सुनकर यह कहना कि प्रभु उनके द्वारा अपने इस स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं।
रायपुर विवेकानंद आश्रम के तत्कालीन सचिव पूज्य स्वामी आत्मानंद जी आश्रम में होने वाली 11 दिवसीय प्रवचन माला में कहते थे कि मुझे इन प्रवचनों में समाधि सुख मिलता है। परमार्थ आश्रम हरिद्वार, ऋषिकेश, पूज्य स्वामी अखंडानंद जी महाराज के आनंदन-वृंदावन में या देश में कहीं भी दिव्य संतों का श्रोतारूप देखते ही बनता था। पूज्य मोरारी बापू जी अपनी कथाओं में उनका नाम लेते हुए भावुक और कृतज्ञ हो जाते हैं। 31 जुलाई से आठ अगस्त, 2027 तक पूज्य बापू पूज्य महाराज श्रीरामकिंकर जी महाराज के प्रति श्रद्धार्पण के लिए “मानस रामकिंकर” नाम से नौ दिन तक रामकथा की गंगा प्रवाहित करेंगे। यह संयोग अतुल्य होगा।
महाराज श्री मेरे जीवन में केवल गुरु नहीं, अपितु त्वमेव माता च पिता त्वमेव की तरह त्वमेव सर्वं मम देव देव हैं।
माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः। स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुः। नान्यं जाने नैव जाने न जाने
मेरा ज्ञान उनको लेकर इतना ही है कि वे मेरे सब कुछ हैं। देश के संत उनके प्रति जितना सुंदर भाव रखते हैं, उसको सुन-देखकर मुझे अतीव सुख मिलता है और मैं सब संतों के प्रति गंगा तट पर बैठे बैठे सुकृतज्ञ रहता हूं। श्रावण शुक्ल प्रतिपदा को “बंबई अस्पताल” से चिकित्सा छोड़कर उन्होंने भगवान श्रीराम की पावन जन्मभूमि आयोध्या में श्रीकिशोरी जी की गोद-जानकीघाट में अपना देह त्याग दिया। उनकी समाधि और अंतिम सभी संस्कार करने के लिए उन्होंने मुझे चुनकर अपने संबंधों के सभी स्वरूपों को स्वीकार किया। उनके द्वारा लिखित लगभग 92 ग्रंथ हैं, जो पाठकों को ग्रंथि मुक्त करके राममय करने के लिए संपूर्ण हैं।
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