आम जन के संत

नाचते-गाते, झांझ-मंजीरा बजाते हुए भी प्रभु की भक्ति की जा सकती है। प्रभु भक्ति के इस स्वरूप को चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं अपनाया और सामान्य जनों को भी इसे अपनाने के लिए प्रेरित किया। भक्तिकाल के प्रमुख संतों में से एक हैं चैतन्य महाप्रभु। वैष्णवों के गौड़ीय संप्रदाय की आधारशिला उन्होंने ही रखी। उन्होंने भजन गायकी की एक नई शैली को जन्म दिया। राजनीतिक अस्थिरता के दिनों में उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता की सद्भावना पर बल दिया। उन्होंने भक्तों को जात-पात, ऊंच-नीच की भावना से दूर रहने की शिक्षा दी।

वृंदावन को पुर्न जीवित किया

कहते हैं कि विलुप्त हो चुके वृंदावन को उन्होने फिर से बसाया। अपने अंतिम समय में वे वहीं रहे। इनका एक नाम गौरांग भी बताया जाता है। ऐसा भी मानते हैं कि यदि गौरांग ना होते तो वृंदावन आज तक एक मिथक ही होता। वैष्णव लोग इन्हें श्रीकृष्ण और राधा रानी के मिलन का प्रतीक स्वरूप का अवतार मानते हैं। इनके ऊपर बहुत से ग्रंथ लिखे गए हैं, जिनमें से श्री कृष्णदास कविराज गोस्वामी का लिखा चैतन्य चरितामृत, श्री वृंदावन दास ठाकुर का लिखा चैतन्य भागवत और लोचनदास ठाकुर का चैतन्य मंगल प्रमुख हैं।

कौन हैं चैतन्य

माना जाता है कि चैतन्य महाप्रभु का जन्म 1486 में पश्चिम बंगाल के नवद्वीप गांव में हुआ, जिसे अब मायापुर कहा जाता है। बचपन में सभी इन्हें निमाई पुकारा करते थे। गौरवर्ण का होने के कारण लोग इन्हें गौरांग, गौर हरि, गौर सुंदर भी कहा करते थे। चैतन्य महाप्रभु द्वारा प्रारंभ किए गए नाम संकीर्तन का अत्यंत व्यापक व सकारात्मक प्रभाव आज देश-विदेश में देखा जा सकता है। इनके पिता का नाम जगन्नाथ मिश्र व मां का नाम शचि देवी था। चैतन्य को उनके अनुयायी कृष्ण का अवतार भी मानते रहे हैं। 1509 में जब ये अपने पिता का श्राद्ध करने बिहार के गया नगर गए, तब वहां इनकी मुलाकात ईश्वरपुरी नामक संत से हुई। उन्होंने निमाई से कृष्ण-कृष्ण रटने को कहा। तभी से इनका सारा जीवन बदल गया और ये हर समय भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन रहने लगे। भगवान श्रीकृष्ण के प्रति इनकी अनन्य निष्ठा व विश्र्वास के कारण इनके असंख्य अनुयायी हो गए। चैतन्य ने अपने इन दोनों शिष्यों के सहयोग से ढोलक, मृदंग, झांझ, मंजीरे आदि वाद्य यंत्र बजाकर व उच्च स्वर में नाच-गाकर हरि नाम संकीर्तन करना प्रारंभ किया।

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Posted By: Molly Seth