ब्रह्मचर्य त्याग का गृहस्थ अनुराग का व संन्यास वैराग्य का प्रतीक है
इस रागमय संसार में अनुरागमय जीवन जी लेना एक गृहस्थ की विशिष्टता है। गृहस्थ आश्रम सभी आश्रमों से श्रेष्ठ माना गया है। इस आश्रम में ब्रह्मचर्य पालन का लाभ मिलता है और वानप्रस्थ और संन्यास का सुफल भी प्राप्त होता है। जैसे भरे घट को ही रिक्तता की अनुभूति होती है। बूंद-बूंद कर भरने से पूर्व की रिक्तता और बूंद-बूंद कर पुन: रिक्त होने की स्थिति
इस रागमय संसार में अनुरागमय जीवन जी लेना एक गृहस्थ की विशिष्टता है। गृहस्थ आश्रम सभी आश्रमों से श्रेष्ठ माना गया है। इस आश्रम में ब्रह्मचर्य पालन का लाभ मिलता है और वानप्रस्थ और संन्यास का सुफल भी प्राप्त होता है।
जैसे भरे घट को ही रिक्तता की अनुभूति होती है। बूंद-बूंद कर भरने से पूर्व की रिक्तता और बूंद-बूंद कर पुन: रिक्त होने की स्थिति की भिन्नता का आस्वाद एक भरा हुआ घट ही बता सकता है, न कि सर्वदा रिक्त रहने वाला या सर्वदा भरा रहने वाला घट। गृहस्थ आश्रम ही वह भरा घट है जिसके सापेक्ष रिक्तता का दर्शन विस्तार पाता है।
गृहस्थ आश्रम ही वानप्रस्थ की भूमिका लिखता है और संन्यास का पथ निर्मित करता है। ब्रह्मचर्य त्याग का प्रतीक है तो गृहस्थ अनुराग का और संन्यास वैराग्य का। त्याग और वैराग्य में ही यह सूक्ष्म भेद है। त्याग इच्छाओं का दमन है, वैराग्य इंद्रियों का संयम है। त्याग में मोहासक्त होने की संभावना बनी रहती है, किंतु वैराग्य में मोहमुक्त होने की भावना प्रबल होती है। मोह से मुक्ति ही वैराग्य का आंतरिक सौंदर्य है। जहां मोह है, वहां वैराग्य नहीं और जहां वैराग्य है वहां मोह नहीं। वस्तुत: निर्मोही व्यक्ति ही वैरागी हो सकता है, विमोही कदापि नहीं। मोह ही वैराग्य की सबसे बड़ी बाधा होती है। इस बाधा को पार करके ही कोई पथिक वैरागी बन सकता है। वैरागी बनने की यह क्रिया कठोरतम साधनाओं में से एक है। वैराग्य वह आचरण है, जो सदेह को विदेह बनाकर अनुकरणीय बनाता है। वैराग्य की भाषा सरल है, पर समझना कठिन, व्यवहार में लाना कठिनतर और तद्नुसार ढल जाना कठिनतम है। मोहमुक्त होना ही केवल वैराग्य नहीं है। परमार्थ युक्त चिंतन के बगैर वैराग्य अधूरा है। परमार्थ चिंतन ही वैराग्य का कांतिमय आभूषण है। वैरागी को निष्कामी तो होना चाहिए, निष्कर्मी नहीं। परहित चिंतन, पर-दुख निवारण और पर-उपकार ही उसका गुण होता है। वैरागी को सरोवर के कीचड़ से दूर रहकर कमल की भांति करुणा, दया, क्षमा और सेवा आदि की सुगंध से संसार को महकाते रहने का सदैव उपक्त्रम करते रहना चाहिए। परमार्थ के साथ-साथ वैरागी को परमात्म चिंतन भी करते रहना चाहिए। परमात्म चिंतन ही परमात्म दर्शन का मार्ग प्रशस्त करता है। परमात्म दर्शन ही वैराग्य का अभीष्ट होता है। याद रखें, सांसारिकता का त्याग ही वैराग्य नहीं है, केवल प्रभु के प्रति अनुराग ही सच्चा वैराग्य है।
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