याज्ञवल्क्य महान अध्यात्मवेत्ता, योगी, ज्ञानी, धर्मात्मा व श्रीराम कथा के मुख्य प्रवक्ता थे
इन उपनिषदों में सबसे प्राचीन तथा आकार में सबसे बड़ा बृहदारण्यक उपनिषद है। याज्ञवल्क्य को इस उपनिषद का सर्वश्रेष्ठ दार्शनिक माना जाता है।
समस्त भारतीय दर्शनों के मूल उपनिषदों में मिलते हैं। ये उपनिषद स्वयं वेद के अंतिम भाग और तात्पर्य हैं।
इन उपनिषदों में सबसे प्राचीन तथा आकार में सबसे बड़ा बृहदारण्यक उपनिषद है। याज्ञवल्क्य को इस उपनिषद का सर्वश्रेष्ठ दार्शनिक माना जाता है। राजा जनक के दरबार में उन्होंने कई बड़े दार्शनिकों से शास्त्रार्थ किया और अपने दर्शन को सर्वोच्च दर्शन सिद्ध किया। उनका अद्वैत वेदांत अतुलनीय है।
याज्ञवल्क्य महान अध्यात्मवेत्ता, योगी, ज्ञानी, धर्मात्मा तथा श्रीराम की कथा के मुख्य प्रवक्ता थे। इन्हें वेदाचार्य महर्षि वैशंपायन का शिष्य माना जाता है। याज्ञवल्क्य का समय 1200 ईसा पूर्व माना जाता है है। उनके विचार और दर्शन मुख्य रूप से बृहदारण्यक उपनिषद के याज्ञवल्क्यीय कांड में उपलब्ध हैं। शंकराचार्य ने उनके बारे में लिखा है कि वे चारों वेदों के ज्ञाता थे। याज्ञवल्क्य अपने दर्शन में वाद-विवाद द्वारा तत्वों की व्याख्या करते थे। यही कारण है कि उन्होंने अपनी पत्नी मैत्रेयी, राजा जनक तथा अन्य विद्वान दार्शनिकों से संवाद करके अपने तत्वज्ञान को विकसित किया। याज्ञवल्क्य मानते थे कि ज्ञान के तीन साधन हैं- श्रवण, मनन और निरंतर चिंतन। उनके अनुसार, आत्मा के श्रवण, मनन और निरंतर चिंतन से सब कुछ ज्ञात हो सकता है।
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