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    क्‍यों स्वस्तिक चिन्ह मांगलिक एवं सौभाग्य सूचक माना जाता रहा है

    By Preeti jhaEdited By:
    Updated: Fri, 14 Oct 2016 11:47 AM (IST)

    यदि हम इतिहास में हजारों वर्ष पीछे जाएं तो सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में ऐसे चिह्न मिले हैं, जिन पर स्वस्तिक अंकित था।

    हर धर्म का एक विशेष चिह्न होता है, सनातन धर्म का भी एक विशेष चिह्न है और वो है 'स्वस्तिक'। स्वस्तिक चिह्न का प्रयोग हिंदू धर्म ही नहीं बल्कि जैन धर्म, बौद्ध धर्म में भी किया जाता है। यदि हम इतिहास में हजारों वर्ष पीछे जाएं तो सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में ऐसे चिह्न मिले हैं, जिन पर स्वस्तिक अंकित था।

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    यह प्रमाण है कि वर्तमान समय से कई हजारों वर्ष पहले मानव सभ्यता ने स्वास्तिक का प्रयोग करना आरंभ कर दिया था। मध्य एशिया के कुछ देशों में स्वस्तिक चिन्ह मांगलिक एवं सौभाग्य सूचक माना जाता रहा है।

    तो वहीं नेपाल में हेरंब, मिस्र में एक्टोन तथा बर्मा में महा पियेन्ने के नाम से पूजा जाता हैं। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैण्ड के मावरी आदिवासियों द्वारा स्वस्तिक को मंगल प्रतीक के रूप में पूजा जाता है।

    बुद्ध के हृदय स्थल में है स्वस्तिक

    स्वस्तिक की आकृति भगवान श्रीगणेश का प्रतीक मानी जाती है, श्री हरि और सूर्य का आसन स्वस्तिक ही माना जाता हैं। बौद्ध धर्म में स्वस्तिक का आकार गौतम बुद्ध के हृदय स्थल पर दिखाया गया है। मेसोपोटेमिया सभ्यता में अस्त्र-शस्त्र पर विजय प्राप्त करने के बाद स्वस्तिक चिह्न का प्रयोग किया जाता था।

    दरअसल, स्वस्तिक एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है प्रसन्नता लाना। वास्तु शास्त्र के अनुसार स्वस्तिक में चार दिशाएं होती हैं। पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण। इसलिए इसे हिन्दू धर्म में हर शुभ कार्य में पूजा जाता है।

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    मान्यता है कि स्वस्तिक मंत्र से हृदय और मन मिल जाते हैं। स्वस्तिक मंत्रोच्चार करते हुए कमंडल से लोगों पर जल के छिड़का जाता है। अमूमन हिंदू मंदिरों में आरती के बाद यह प्रक्रिया की जाती है।

    यह जल पारस्परिक क्रोध और वैमनस्य को शांत करता है। वहीं, स्वस्ति मन्त्र का पाठ करने की क्रिया 'स्वस्तिवाचन' कहलाती है। गृहनिर्माण के समय स्वस्तिक मंत्र का उच्चारण करना बहुत शुभ माना जाता है।

    ऊं स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः

    स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः

    स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः

    स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु

    ऊं शान्तिः शान्तिः शान्तिः