रामायण का वो मौन त्याग, जिसकी चर्चा कम हुई; 13 वर्षों तक पति से दूर क्यों रहीं शत्रुघ्न की पत्नी श्रुतकीर्ति?
वाल्मीकि रामायण में श्रुतकीर्ति, माता सीता की चचेरी बहन और शत्रुघ्न की पत्नी, का त्याग अक्सर अनकहा रह जाता है। ...और पढ़ें
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रामायण में श्रुतकीर्ति कौन थी? (Picture Credits- AI Images)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। वाल्मीकि रामायण में प्रभु श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण और भरत के त्याग से दुनिया भाली भांति परिचित है। लेकिन इसी महाकाव्य में एक पात्र ऐसे भी है, जिसकी चर्चा भले ही कम होती हो, लेकिन उसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। माता सीता की चचेरी बहन और जनक जी के छोटे भाई कुशध्वज की पुत्री जिनका विवाह राम जी के सबसे छोटे भाई शत्रुघ्न से हुआ था।
वाल्मीकि रामायण के बालकांड अध्याय के मुताबिक, जब चारों भाइयों के शादी की चर्चा मिलती है। श्रीराम जी की शादी मां सीता से, लक्ष्मण की उर्मिला संग, भरत के साथ मांडवी का ब्याह और शत्रुघ्न के साथ श्रुतकीर्ति का विवाह संपन्न हुआ था।

श्रतुकीर्ति का परम त्याग
वाल्मीकि रामायण में श्रुतकीर्ति से जुड़ी एक लोकप्रिय प्रचलित कथा यह भी है कि, एक रात जब माता कौशल्या उन्हें महल की छत पर अकेले ठहलते हुए देखा तो पहरेदारों को उन्हें बुलाने के लिए भेजा। श्रुतकीर्ति जब आईं तब माता कौशल्या ने पूछा कि तुम अकेले ही छत पर क्यों टहल रही हो और शत्रुघ्न कहां हैं? इस पर श्रुतकीर्ति कहती हैं कि, माता! मैंने उन्हें 13 वर्षों से नहीं देखा है।
यह सुनने के बाद माता कौशल्या काफी दुखी और हैरान हुई। उन्होंने आधी रात को ही सैनिकों के साथ शत्रुघ्न को ढूंढने निकल गई। सभी जगह ढूंढने पर उन्हें पता चला कि शत्रुघ्न नंदीग्राम में हैं। नंदीग्राम में ही भरत कुटिया बनाकर वहीं से सारा राजपाठ का काम संभालते थे। माता कौशल्या वहां पहुंची तो उन्होंने देखा कि भरत की कुटिया के पास ही शत्रुघ्न अपनी बांह को तकिया बनाकर सो रहे थे।
माता कौशल्या ने जब उनको इस तरह से सोते हुए देखा तो काफी भावुक हो उठी। शत्रुघ्न ने जैसी ही मां की आवाज सुनी तो फौरन खड़े होकर माता को प्रणाम किया। उन्होंने कहा, माता आपने यहां आने का कष्ट क्यों किया? मुझे ही महल में बुलवा लिया होता।
कौशल्या माता ने बड़े ही प्यार से कहा कि, एक मां अपने बेटे से मिलने नहीं आ सकती क्या? मैं भी आज अपने बेटे से ही मिलने आई हूं। लेकिन तुम इस अवस्था में क्यों सो रहे हो।
शत्रुघ्न काफी भावुक हो उठे और उन्होंने कहा कि, मां, बड़े भैया राम पिता की आज्ञा से वनवास में चले गए। भैया लक्ष्मण भी उनके साथ गए। इधर भैया भरत कुटिया बनाकर साधु का भेष धारण किया अपना कर्तव्य निभा रहे हैं। क्या ये राजमहल और राजसी ठाट-बाट सब मेरे लिए ही हैं?
माता कौशल्या शत्रुघ्न के इस सवाल का जवाब न दे पाई और वह एकटक शत्रुघ्न को देखती ही रही। दरअसल शत्रुघ्न राजसी भेष में रहकर राजकाज से जुड़ा कार्य करते थे, लेकिन उन्होंने अपनी पत्नी श्रुतकीर्ति से दूरी बना ली थी और राजमहल की भोग-विलासिता का भी त्याग कर दिया था।
हालांकि बाद में शत्रुघ्न को मथुरा का राजा बनाया गया, जहां उन्हें अपनी पत्नी श्रुतकीर्ति के साथ रहने का आदेश दिया गया।
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