विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

दीवाली पर भगवान विष्णु नहीं, मां लक्ष्मी के साथ क्यों पूजे जाते हैं गणेश जी? इस प्रथा के पौराणिक रहस्य को समझें

Published: Sun, 08 Nov 2026 08:00 AM (GMT+05:30)

दीवाली पर मां लक्ष्मी के साथ गणेश जी की पूजा धन और बुद्धि के संतुलन को दर्शाती है। पौराणिक कथा ...और पढ़ें

दीवाली पर लक्ष्मी-गणेश पूजा का पौराणिक रहस्य (Picture Credit: AI Generated)

दीवाली पर लक्ष्मी-गणेश पूजा का पौराणिक रहस्य (Picture Credit: AI Generated)

HighLights

  1. धन और बुद्धि का संतुलन दर्शाती है यह पूजा।

  2. बिना विवेक के लक्ष्मी स्थाई रूप से नहीं ठहरतीं।

  3. माता लक्ष्मी ने गणेश जी को पुत्र रूप में अपनाया।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। आपने हमेशा देखा है कि दीवाली के पर्व में माता लक्ष्मी के साथ गणेश जी की पूजा की जाती है। आमतौर पर माता लक्ष्मी को विष्णु जी के साथ विराजमान देखा जाता है, फिर इस खास दिन में माता लक्ष्मी के साथ गणेश जी का पूजन क्यों होता है? ऐसे सवाल कई बार मन में आते हैं और उनका उत्तर जान लेना भी जरूरी होता है।

एस्ट्रोपत्री के ज्योतिषी चंद्रेश शर्मा के अनुसार, दीवाली के दिन धन-समृद्धि की देवी मां लक्ष्मी के साथ बुद्धि-विवेक के देवता भगवान श्री गणेश की पूजा करने के पीछे बहुत गहरे धार्मिक, पौराणिक और व्यावहारिक कारण निहित हैं। आइए जानते हैं इस प्रथा से जुड़ी मुख्य बातें क्या हैं।

धन और बुद्धि का मेल

मां लक्ष्मी धन, ऐश्वर्य और भौतिक समृद्धि की प्रतीक मानी जाती हैं, जबकि भगवान गणेश बुद्धि, विवेक और शुभता के प्रतीक माने जाते हैं। इसी वजह से दीवाली के पर्व में माता लक्ष्मी के साथ गणेश जी की पूजा होती है।

स्थायी समृद्धि

यदि व्यक्ति को केवल धन प्राप्त हो जाए और सद्बुद्धि यानी गणेश जी की कृपा न हो, तो वह उस धन का दुरुपयोग कर सकता है या अहंकार में आकर अपना सर्वनाश कर सकता है। इसी बात का प्रतीक मानी जाती है दीवाली के दिन माता लक्ष्मी के साथ गणपति की पूजा। किसी भी व्यक्ति के पास धन और बुद्धि का संतुलन होना जरूरी है।

स्थाई वास

एस्ट्रोपत्री के ज्योतिषी चंद्रेश शर्मा के अनुसार, यह स्पष्ट माना है कि बिना विवेक के लक्ष्मी कभी भी स्थाई रूप से नहीं ठहरती हैं। इसी वजह से धन का उचित उपयोग और उसका सही संरक्षण तभी संभव है जब मनुष्य के पास विवेक हो।

पौराणिक कथा और वरदान

एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार मां लक्ष्मी को अपने ऐश्वर्य और सुंदरता पर थोड़ा अभिमान हो गया था और तब उन्होंने भगवान विष्णु से अपनी पूर्णता के बारे में पूछा, उस समय विष्णु जी ने कहा कि स्त्री तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती है जब तक वह मातृत्व का सुख प्राप्त न करे।

आपके कोई संतान नहीं है, इसलिए आप अभी अपूर्ण हैं। यह सुनकर माता लक्ष्मी दुखी होकर अपनी सखी माता पार्वती के पास गईं और उनसे एक पुत्र गोद लेने का अनुरोध किया। तब माता पार्वती ने अपने पुत्र गणपति को माता लक्ष्मी को दत्तक पुत्र के रूप में सौंप दिया।

उसी समय से गणेश जी माता लक्ष्मी के दत्तक पुत्र बन गए और इससे अत्यधिक प्रसन्न होकर माता लक्ष्मी ने गणेश जी को वरदान दिया कि आज से संसार में जहां भी मेरी पूजा होगी, वहां सबसे पहले मेरे पुत्र गणेश की पूजा की जाएगी। जो व्यक्ति गणेश जी की पूजा किए बिना केवल मेरी पूजा करेगा, उसे मेरी कृपा कभी प्राप्त नहीं होगी। उसी समय से दीवाली के दिन भी माता लक्ष्मी के साथ गणपति की पूजा का विधान शुरू हुआ।

वास्तव में यह प्रथा सदियों पुरानी है और दीवाली पर माता लक्ष्मी के साथ गणपति की पूजा करने से दोनों का आशीर्वाद मिलता है और घर में समृद्धि बनी रहती है।

यह भी पढ़ें- दीवाली पूजन में लक्ष्मी जी के साथ 'श्रीगणेश' और 'सरस्वती' ही क्यों? वजह कर देगी हैरान!

यह भी पढ़ें- रामायण से लेकर पुराणों तक: भगवान राम के लौटने की खुशी कैसे बन गई दीवाली का त्योहार?

अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।

देश और दुनिया की ताजा खबरों के लिए Hindi News देखें। Live Cricket Score , IPO Listings, Shiv Chalisa, राशिफल और दुर्गा चालीसा पर अन्य जानकारी पाएं।