दिवाली पर देवताओं के दुश्मन की पूजा? जानिए उस 'असुर राजा' की दास्तान, जिसके स्वागत में जलते हैं करोड़ों दीये!
दीवाली का त्योहार राजा बलि और भगवान विष्णु के वामन अवतार की कथा से जुड़ा है। इस कथा में बलि ...और पढ़ें

राजा बलि और वामन अवतार की कथा का दिवाली से क्या संबंध है? (Picture Credits- AI Images)
HighLights
राजा बलि भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद के पोते थे।
वामन अवतार ने बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी।
बलि को दीवाली पर तीन दिन पृथ्वी पर रहने का वरदान।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू पौराणिक ग्रंथों में ऐसी कई कथाएं हैं जो जीत और करुणा को बेहद ही सुंदरता से प्रस्तुत करती हैं। ऐसी ही एक कथा भगवान विष्णु के वामन अवतार और महान असुर राजा बलि की से जुड़ी है। बहुत से लोगों को इस बात की जानकारी नहीं होगी कि दीवाली के मौके पर भारत के कुछ हिस्सों में एक असुर राजा की पूजा-अर्चना की जाती है।
यह सुनने में काफी अजीब लग सकता है लेकिन जिस भारतीय संस्कृति में देवताओं के दुश्मनों को नकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है, वहीं पर एक असुर राजा का इतना सम्मान क्यों किया जाता है?
राजा बलि कौन थे?
राजा बलि कोई साधारण असुर नहीं थे। वे भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद के पोते थे। अपने दादा की ही तरह उनके मन में भी ईश्वर के प्रति अपार भक्ति और गहरी आस्था थी। वे एक शक्तिशाली और न्यायप्रिय शासक थे। उनके राज में प्रजा काफी खुशहाल और समृद्ध थी। उन्होंने अपनी तपोशक्ति के बल पर तीनों लोकों (पृथ्वी, स्वर्ग और पाताल) पर अधिकार कर लिया था।
जब राजा बलि इंद्र को हराकर स्वर्ग पर भी अपना शासन स्थापित कर लेते हैं, तो सभी देवता चिंतित हो जाते हैं। सभी देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना कि की वे राजा बलि को परास्त करके उससे तीनों लोकों का अधिकार छीन लें। जब राजा बलि यज्ञ कर रहे थे, तब भगवान विष्णु वामन रूप में वहां आए।
भगवान विष्णु ने राजा बलि से 3 पग भूमि दान में मांगी। दानवीर राजा बलि ने सोचा कि एक वामन तीन पग में कितनी ही भूमि ले लेगा, इसलिए उन्होंने भगवान विष्णु को तीन पग भूमि दान देना का वचन दे दिया।
राजा बलि के ऐसे कहते ही वामन रूपी भगवान विष्णु ने खुद को इतना विशाल बना लिया कि उनके अंदर तीनों लोक दिखाई देने लगे। भगवान विष्णु के अवतार वामन देव ने अपने पहले ही पग में स्वर्ग समेत पृथ्वी को नाप लिया। उनके दूसरे पग में पूरा संसार आ गया। अब उनके पास अपना तीसरा पग रखने का स्था नहीं था। इसके बाद राजा बलि के कहने पर भगवान वामन ने अपना तीसरा पग उनके सिर के ऊपर रख दिया।
राजा बलि की इस भक्ति भावना और दानशीलता से वामन महाराज इतने खुश हुए कि, उन्होंने उसे वरदान मांगने को कहा। असुर राजा बलि ने वरदान मांगते हुए कहा कि, मैंने अपनी स्वेच्छा से आपको जमीन दान की है। इस वजह से मैं अब हर साल तीन दिनों के लिए तीनों लोकों पर राज्य करना चाहता हूं। उस दौरान जो कोई भी व्यक्ति पृथ्वी पर दीपदान से जुड़े धार्मिक कार्यों को करेगा, आपकी पत्नी मां लक्ष्मी उसी के घर में वास करेंगी।
तब वामन देव ने बलि को पाताल लोक का राजा घोषित कर दिया और उस युग के आखिर तक अमर होने का वरदान दिया। राजा बलि की उदारता की वजह से भगवान विष्णु ने उसे कार्तिक मास की चतुर्दशी के दिन से ठीक एक दिन पूर्व, दीवाली और उसके अगले दिन तक तीन दिनों तक पृथ्वी पर निवास करने का वरदान दिया।
राजा बलि की दानवीरता काफी प्रसिद्ध थी। इसलिए उनके आने की खुशी में पूरे घर में दीये जलाकर उनका स्वागत किया जाता है। लेकिन भविष्य पुराण के मुताबिक राजा बलि कई अन्य राक्षसों और दैत्यों के साथ आते हैं, जो दुष्ट स्वभाव के होते हैं। इसलिए उन्हें किसी भी तरह की अराजकता या आतंक मचाने से रोकने के लिए दीपक जलाए जाते हैं।
ये दैत्य दीयों की रोशनी से काफी डरते हैं और जिस भी घर में दीया जलता है उस घर में जाने की हिम्मत नहीं दिखाते हैं। माना जाता है कि इससे उस रात लोगों की राजा बलि के राक्षसों से रक्षा भी होती है। भविष्य पुराण के मुताबिक, दीवाली की रात और दीवाली के अगले दिन को बलि प्रतिपदा के रूप में भी मनाया जाता है।
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