क्यों कहा जाता है मां दुर्गा को 'शेरावाली माता'? पौराणिक कथाओं के पीछे छुपा है बड़ा रहस्य
मां दुर्गा को भक्त प्यार से 'शेरावाली माता' कहकर भी बुलाते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि उन्हें यह ...और पढ़ें

मां दुर्गा को 'शेरावाली माता' क्यों कहते हैं, जानें रहस्य (Picture Credit: AI Generated)
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मां दुर्गा को 'शेरावाली माता' शेर पर सवार होने से कहते हैं।
शेर शक्ति, साहस और निर्भयता का प्रतीक है, अहंकार पर नियंत्रण।
महिषासुर वध और पार्वती की तपस्या से जुड़ी हैं कथाएं।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। माता दुर्गा के अनगिनत स्वरूप हैं जिनकी पूजा से भक्तों को कई लाभ होते हैं। मुख्य रूप से नवरात्र के दौरान माता का पूजन विधि-विधान के साथ किया जाता है। लोग माता को अलग-अलग नामों से बुलाते हैं और उनकी भक्ति में डूब जाते हैं। इन्हीं में से एक नाम है शेरावाली माता।
माता का स्वरूप जैसे ही सामने आता है मां शेर पर सवार नजर आती हैं। ऐसा माना जाता है कि जब भी धरती पर अधर्म बढ़ता है तब शक्ति स्वयं प्रकट होती हैं। ऐसे ही जब शक्ति माता दुर्गा के रूप में अवतरित हुईं तब उनके साथ जो तत्व था वो उनका शेर ही था।
माता का वाहन शेर होने के पीछे एक अद्भुत कथा है जो आपको यह भी बताती है कि माता दुर्गा को 'शेरावाली माता' क्यों कहा जाता है। आइए आपको बताते हैं इसके बारे में यहां विस्तार से।
माता दुर्गा का नाम क्यों पड़ा 'शेरावाली माता'?
मां दुर्गा का वाहन शेर केवल उनकी सवारी ही नहीं, बल्कि शक्ति, साहस और निर्भयता का प्रतीक भी है। माता दुर्गा के सिंह पर सवार स्वरूप को देखकर भक्त उन्हें प्रेम से 'शेरावाली माता' कहते हैं।
शेर को जंगल का राजा कहा जाता है और वह अहंकार, शक्ति और दंभ का प्रतीक होता है। इसी वजह से माता दुर्गा का शेर पर सवार होना यह दिखाता है कि शक्ति वही श्रेष्ठ है जो अहंकार पर नियंत्रण पाए और जिससे भय का नाश हो सके।
माता दुर्गा का वाहन शेर कैसे बना?
प्राचीन काल में महिषासुर नामक असुर ने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया कि उसे कोई पुरुष, देवता या मानव मार नहीं सकता। इस वरदान के बल पर उसने तीनों लोकों में आतंक मचा दिया। देवता पराजित हो गए। स्वर्ग छीन गया और पृथ्वी भय से कांपने लगी। तब सभी देवता एकत्र होकर त्रिदेव, ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास पहुंचे।
देवताओं के तेज से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई। वह शक्ति थी माता दुर्गा। जब माता दुर्गा प्रकट हुई उसी समय धरती कांप उठी। वनों से एक भयंकर किंतु तेजस्वी शेर गर्जना करता हुआ आया। देवताओं ने उस शेर को माता के चरणों में अर्पित किया। माता मुस्कुराई और शेर उनके चरणों में नतमस्तक हो गया। तभी से शेर माता दुर्गा का वाहन बन गया।
भगवान शिव और माता पार्वती की कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार सदियों पहले एक बार जब भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए माता पार्वती ने कई सालों तक तपस्या की तब उस तपस्या का तेज इतना ज्यादा था कि मां पार्वती का गौर वर्ण सांवला पड़ गया था। बाद में माता की तपस्या सफल हुई भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया। विवाह के बाद एक दिन माता पार्वती भगवान शिव के साथ कैलाश पर बैठी थीं और उसी समय शिव जी ने हंसते हुए माता को 'काली' नाम से पुकारा।
तब माता कैलाश पर्वत छोड़कर वापस वन में अपने गोरे रंग को पाने के लिए तपस्या में लीन हो गईं। उसी समय एक शेर माता के पास आया और उन्हें तपस्या में लीन देखकर वहीं बैठ गया। कई साल माता तपस्या में लीन रहीं और शेर वहीं बैठा रहा। जब माता तपस्या से बाहर आईं उस समय माता ने प्रसन्न होकर शेर को अपनी सवारी के रूप में स्वीकार कर लिया। शेर पर सवार होने के कारण माता दुर्गा का नाम 'शेरा वाली माता' पड़ा।
माता के अलग नामों की अपनी कुछ कथाएं हैं, लेकिन भक्त उन्हें माता दुर्गा के रूप में पूजते हैं और अलग स्वरूपों में भी उनकी भक्ति करते हैं।
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