गणेश उत्सव और नवरात्र के ठीक बीच में ही क्यों आता है 'पितृपक्ष'? यहां समझें इन पावन दिनों का असली रहस्य
पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन की सनातन परंपरा हैं श्राद्ध कर्म। क्या है इनकी वास्तविक अवधारणा और क्यों आवश्यक है ...और पढ़ें
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पितृपक्ष के बाद शुरू होते हैं नवरात्र (Picture Credit- AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
स्वामी मैथिली शरण, ऋषिकेश। श्राद्ध की परंपरा में सभी दिशाओं, ऋतुओं, देवताओं, यमराज और भीष्म आदि सबका नाम लेकर तर्पण किया जाता है। कृतज्ञता ज्ञापन की इस विशद परंपरा ने ही तो गंगा का अवतरण किया, भगवान का अवतरण किया; और हमारी वंश परंपरा को यह ज्ञान दिया कि जो हमारे थे, हैं और होंगे, हम उन सबका स्मरण करें।
यही हमारी दिव्य सनातन परंपरा है। श्रद्धापूर्वक और पवित्र अंतःकरण से, प्रदर्शन की वृत्ति से मुक्त होकर, अपने पूर्वजों-जैसे दादा-दादी या जो भी पितर हैं-उनकी पुण्य स्मृति में किया गया कोई भी श्रेष्ठ व परोपकारी कार्य ही वास्तव में श्राद्ध कर्म है। श्राद्ध पक्ष अत्यंत पवित्र और दो बड़े पर्वों के मध्य संपुटित (जुड़ा हुआ) है। पितृपक्ष से ठीक पूर्व हम सब विवेक के देवता भगवान गणेश का पार्थिव स्थापन और विसर्जन कर चुके होते हैं और पितृपक्ष के तुरंत पश्चात देवी आराधना का परम पवित्र नवरात्र पर्व प्रारंभ होता है।
समर्पण का यह पावन काल
पूरे वर्ष में केवल यही एक पक्ष ऐसा है, जो न शुक्ल कहलाता है और न कृष्ण; अपितु इसका नाम है 'श्राद्ध पक्ष'। श्राद्ध पक्ष में चंद्रमा अमावस्या की ओर बढ़ते हुए अंततः विलीन हो जाता है। अमावस्या की तिथि को वस्तुतः चंद्रमा की सूर्य के प्रति संपूर्ण समर्पण की तिथि माना जाता है। हम सब सांसारिक लोग भी उसी चंद्रमा की तरह हैं, जो अपने पूर्वजों और पितरों के पुण्य-प्रताप रूपी सूर्य से प्रकाशित हो रहे हैं। हमें केवल पितृपक्ष में ही नहीं, बल्कि चंद्रमा की भांति पूरे वर्ष इस सूर्य की महिमा के प्रति नतमस्तक रहना चाहिए। हमारे जीवन में आज जो भी है, अतीत में जो कुछ था और भविष्य में जो भी होगा, वह सब पूर्वजों और पितरों की ही असीम कृपा का परिणाम है। कृतज्ञता ज्ञापन ही मनुष्य के अहंकार-मुक्त होने का सबसे सरल और सुलभ मार्ग है।
सफल होते हैं सभी कार्य
माता, पिता, दादा, दादी आदि अपनी संतति का अंतिम सांस तक केवल उत्कर्ष ही चाहते हैं और उसके लिए अपनी शक्तिभर प्रयास भी करते हैं। तो क्या हम यह कह सकते हैं कि मृत्यु के उपरांत वे हमारा हित नहीं चाहेंगे? कदापि नहीं। उनका आशीष तो तब भी हमारे साथ रहता है। जब पितर ईश्वर में विलीन हो जाते हैं, तब उनके निमित्त हमारा सत्कार ईश्वर के विश्वरूप की, विराट की दिव्य पूजा बन जाता है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष के वे 15 दिन, जिनमें हम अपने पूर्वजों की पावन स्मृति में लीन रहते हैं, वह काल भले ही 'कृष्ण पक्ष' (अंधकार का पक्ष) कहलाता हो, किंतु वह हमारे अंतःकरण को हमेशा 'शुक्लवर्गीय' (प्रकाशमान और पवित्र) बनाए रखता है। इस पक्ष में किया गया कोई भी श्रेष्ठ कार्य अवश्य सफल होता है, क्योंकि इस काल में हमारे पितर जागृत रहते हैं। धार्मिक अनुष्ठान, असहाय लोगों की सेवा, मंदिरों में प्रसाद वितरण, सत्संग और कथा-कीर्तन से श्राद्ध पक्ष में कई गुना अधिक फल की प्राप्ति होती है।
धर्म का अनंत यज्ञचक्र
परोपकार के श्रेष्ठ कर्म जब ईश्वर को अर्पित कर दिए जाते हैं, तब वही कर्म श्राद्ध बन जाता है और हमारी श्रद्धा से युक्त होकर साक्षात पूजा का रूप ले लेता है। ईश्वर को जिस काल में भी अंतःकरण में धारण कर लिया जाए, वही काल हमारे वास्तविक जागरण का काल है। ईश्वर और पूर्वजों की स्मृति का कोई निश्चित मुहूर्त नहीं होता, उनका स्मरण ही सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त है। हमारे गुरुदेव, पूज्य पाद श्रीरामकिंकर जी महाराज कहा करते थे कि 'अरे भाई! गया-श्राद्ध करने के बाद भी यदि पितरों के निमित्त श्राद्ध विषयक कुछ श्रेष्ठ कार्य करने का अवसर मिले, तो उसे प्रभु-कृपा और उनकी साक्षात पूजा का भाव मानकर करते रहना चाहिए।' यही वास्तव में धर्म का अनंत यज्ञचक्र है!
बलिदानियों का पुण्य स्मरण
श्राद्ध का अर्थ केवल स्वजनों तक सीमित नहीं है। जब हम श्राद्ध पक्ष में अज्ञात पितरों के लिए दीपदान करते हैं या जल देते हैं, तो अनजाने में ही सही, हम उन सभी वीरों, ऋषियों और देशभक्तों के प्रति भी अपनी कृतज्ञता ज्ञापित कर रहे होते हैं जिन्होंने समाज के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। तर्पण के समय एक मंत्र में कहा जाता है:
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवाः। तृप्यन्तु पितरः सर्वे मातृमातामहादयः॥
इसका अर्थ है: ब्रह्मा से लेकर तिनके तक, इस सृष्टि में जितने भी देव, ऋषि, मनुष्य, माता-पिता और पूर्वज हुए हैं, वे सब मेरे तर्पण से तृप्त हों। जो देश और समाज के लिए बलिदान हुए, वे हमारी इसी व्यापक पितृ-चेतना का हिस्सा हैं। इसी प्रकार एक अन्य मंत्र है:
ये बान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः। ते तृप्तिं अखिलां यान्तु ये चास्मत्तोऽकांक्षिणः॥
अर्थात्, जो इस जन्म में मेरे बांधव (रिश्तेदार) थे, या जो किसी अन्य जन्म में मेरे बांधव थे, अथवा जो मुझसे जल की आकांक्षा रखते हैं (जिनका कोई तर्पण करने वाला नहीं है), वे सब तृप्त हों।
सुस्पष्ट रहे नई पीढ़ी की दृष्टि
किसी भी सिद्धांत और नियम की एक सुनिश्चित एवं पवित्र संहिता होती है, चाहे वह श्रुति परंपरा से प्राप्त हुई हो या अध्ययन से; श्राद्ध भी हमारी आस्तिक परंपरा की एक ऐसी ही दिव्य शाखा है। यह अत्यंत आवश्यक है कि बालकों और युवाओं को अपनी श्रुति परंपरा पर पूर्ण विश्वास हो, ताकि उनकी दृष्टि स्वच्छ और सुस्पष्ट रहे। शास्त्रों ने गया जी में श्राद्ध के विलय का विधान इसलिए किया है ताकि जिसका आगे कोई वंश न हो, वह अगले जन्म में निर्वंश न रहे। कर्तव्य की पूर्ति का विधान भले ही गया जी में जाकर पिंडदान देने से पूर्ण हो जाए, किंतु भाव की पूर्ति तो पितरों के प्रति सच्ची श्रद्धा और हमारे प्रति किए गए उनके उपकारों के स्मरण से ही होती है।
प्रतिवर्ष श्राद्ध करके हम उसी भाव की पूर्ति करते हैं और स्वयं को धन्य करते हैं। मैं वर्तमान पीढ़ी से यह निवेदन करता हूं कि जब हम अपने पालतू पशुओं (जैसे श्वान) के प्रति इतने कृतज्ञ हो सकते हैं कि प्रातःकाल से लेकर रात्रि पर्यंत उनकी सारी आवश्यकताओं को हृदय से लगाकर पूरा करते हैं, उन्हें अपने घर का सदस्य मानकर राखी तक बांध देते हैं और यह सब करते हुए हमें न तो कोई थकान होती है और न ही कोई संकोच; तो फिर वर्ष में एक दिन अपने पितरों की स्मृति के लिए क्यों नहीं? जिन्होंने जीवनभर हमारे लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया और भगवान से केवल हमारी कुशलता की प्रार्थना करते रहे, क्या हमारे मन में उनके प्रति कोई कृतज्ञता का भाव नहीं होना चाहिए?
तुलसीदास का दिव्य संदेश
गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस के बालकांड में लिखा है:
जे प्राकृत कबि परम सयाने। भाषां जिन्ह हरि चरित बखाने॥
भए जे अहहिं जे होइहहिं आगे। प्रनवउं सबहिं कपट सब त्यागे॥
अर्थात्, जो मुझसे पहले हो चुके हैं, जो वर्तमान में हैं और जो भविष्य में होंगे, जिन्होंने भी अपनी भावना और भाषा के माध्यम से भगवान के पावन चरित्र का वर्णन किया है, मैं निष्कपट भाव से उन सभी के चरणों में अपना प्रणाम निवेदित करता हूं। यही हमारी आध्यात्मिक श्राद्ध परंपरा है-सबके प्रति सम्मान निवेदित करना!
(लेखक श्रीरामकिंकर विचार मिशन के संस्थापक अध्यक्ष हैं)
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