नरक चतुर्दशी पर कृष्ण की जय-जयकार होती है, पर असली हीरो तो सत्यभामा थीं? पढ़ें पौराणिक कथा
भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा को भूदेवी का अवतार माना जाता है। उन्होंने नरकासुर का वध कर 16000 कन्याओं को ...और पढ़ें
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नरकासुर युद्ध में सत्यभामा की अहम भूमिका (Picture Credits- AI Images)
HighLights
सत्यभामा भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी और भूदेवी का अवतार थीं।
नरकासुर को भूदेवी के हाथों ही मृत्यु का वरदान प्राप्त था।
सत्यभामा ने नरकासुर का वध कर 16000 कन्याएं मुक्त कीं।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। महाभारत के सभी पात्र किसी न किसी के अवतार थे और सबकी एक अपनी भूमिका निर्धारित थी। भगवान श्रीकृष्ण के जीवन में राधा रानी प्यार का प्रतीक थी लेकिन इसके पश्चात श्रीकृष्ण ने तीन शादियां की क्योंकि उनकी तीनों पत्नियों की भूमिका पहले से तय थी।
भगवान श्रीकृष्ण की पत्नियों में सबसे ज्यादा नाम रुक्मिणी का देखने को मिलता है लेकिन श्रीकृष्ण के जीवन में उनकी दूसरी पत्नी सत्यभामा की भी भूमिका बेहद खास थी।
सत्यभामा का भूदेवी यानी 'पृथ्वी देवी' का अवतार माना जाता है। उनका विवाह श्रीकृष्ण से हुआ था, जो अपनी सुंदरता, हिम्मत और दृढ़ता के लिए जानी जाती हैं।
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सत्यभामा कौन थीं?
भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा यादव वंश के राजा सताजित की बेटी थीं। स्वभाव से काफी साहसी, आत्मविश्वासी और दयालु भी थीं।
सत्यभामा को भूदेवी का अवतार माना जाता है, जो धरती की ऊर्जा और सामर्थ्य का प्रतीक है। कहा जाता है कि सताजित के पास सूर्य देव द्वारा प्रदान किया गया स्यमंतक मणि नाम का दिव्य रत्न था।
नरकासुर युद्ध में सत्यभामा की भूमिका
पौराणिक कथाओं के मुताबिक, नरकासुर असुर का अंत करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने सत्यभामा की मदद मांगी थी। नरकासुर स्वभाव से काफी दुराचारी असुर था, जिसने देवताओं और पृथ्वी लोक में जमकर आंतक मचा रखा था। उसने 16000 कन्याओं को बंदी बना लिया था।
पौराणिक कथा के मुताबिक, नरकासुर को वरदान हासिल था कि उसकी मौत सिर्फ भूदेवी के हाथों ही लिखी है। चूंकि सत्यभामा को भूदेवी का अवतार माना जाता था और नरकासुर भूदेवी का पुत्र है, इसलिए इस युद्ध में सत्यभामा की भूमिका बेहद खास मानी जाती है।
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जब नरकासुर का अत्याचार बढ़ा गया, तब भगवान श्रीकृष्ण सत्यभामा को साथ लेकर युद्ध की भूमि में पहुंचे। इस दौरान श्रीकृष्ण और नरकासुर के बीच काफी भयंकर युद्ध हुआ। कथाओं में बताया जाता है कि एक समय ऐसा भी आया कि जब श्रीकृष्ण कुछ खास पलों के लिए अचेत हो गए। तब सत्यभामा ने हिम्मत दिखाते हुए खुद धनुष उठाया और नरकासुर पर वार किया।
इस प्रहार से नरकासुर का वध हो गया। आखिर में बंदी बनाई गई महिलाओं को नरकासुर के चंगुल से मुक्त कराया गया। इस तरह से नरकासुर का वध हुआ और बंदी कन्याओं को रिहा कराया गया। इस घटना की याद में कई लोग आज भी नरक चतुर्दशी या छोटी दीवाली का संबंध नरकासुर के वध से जोड़कर देखते हैं।
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