नरक चतुर्दशी पर मृत्यु होने का क्या है धार्मिक महत्व, क्या सच में इस दिन खुले होते हैं स्वर्ग के द्वार?
हिंदू धर्म में नरक चतुर्दशी को छोटी दिवाली कहा जाता है। इस दिन मृत्यु होने का क्या है धार्मिक महत्व? ...और पढ़ें

नरक चतुर्दशी पर मृत्यु का धार्मिक महत्व । (Picture Credit- AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में नरक चतुर्दशी को छोटी दिवाली और रूप चौदस के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध करके लोगों को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी। इस दिन यमराज की पूजा, दीपदान और अभ्यंग स्नान करने की भी परंपरा है।
गरुड़ पुराण में मृत्यु और आत्मा की यात्रा को लेकर भी इस तिथि से जुड़ी कई मान्यताएं बताई गई हैं। आइए जानते हैं नरक चतुर्दशी पर मृत्यु होने को लेकर धार्मिक महत्व और स्वर्ग के द्वार से जुड़ी क्या मान्यता है।
नरक चतुर्दशी पर मृत्यु होने से जुड़ी मान्यता
हिंदू धर्म में मृत्यु को जीवन का एक अटल सत्य है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मनुष्य के कर्मों का प्रभाव उसकी आत्मा की आगे की यात्रा से जुड़ा होता है। नरक चतुर्दशी को यमराज की पूजा के लिए विशेष दिन माना जाता है। इसी वजह से इस तिथि पर मृत्यु से जुड़ी कुछ मान्यताएं भी हैं। कहा जाता है कि इस दिन मृत्यु होने पर आत्मा को स्वर्ग का मार्ग मिलता है और उसे नरक के कष्टों से मुक्ति मिलती है।
यमराज और स्वर्ग के द्वार से क्या है संबंध?
हिंदू धर्म में यमराज को मृत्यु और न्याय का देवता माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वे मनुष्य के कर्मों के आधार पर उसके परलोक से जुड़े निर्णय लेते हैं। नरक चतुर्दशी पर यमराज की पूजा करने और उनके नाम से दीपदान करने की परंपरा है। कहा जाता है कि इस दिन स्वर्ग के द्वार खुले होते हैं।
नरक चतुर्दशी पर क्यों किया जाता है यम दीपदान?
नरक चतुर्दशी पर यमराज के लिए दीपदान करने की भी परंपरा है। मान्यता है कि इस दिन दीपक जलाने से यमराज की कृपा प्राप्त होती है और परिवार पर आने वाले संकटों से रक्षा होती है। कई घरों में शाम के वक्त दक्षिण दिशा की ओर यम के नाम का दीप जलाया जाता है। इस रिवाज का मुख्य उद्देश्य मृत्यु के भय से मुक्ति, परिवार की मंगलकामना और जीवन की सुरक्षा के लिए प्रार्थना करना है।
अभ्यंग स्नान और भगवान श्रीकृष्ण की पूजा का महत्व
नरक चतुर्दशी पर सूर्योदय से पहले अभ्यंग स्नान करने की परंपरा भी प्रचलित है। इसमें शरीर पर तेल लगाकर स्नान किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, ऐसा करने से नकारात्मकता दूर होती है और जीवन में शुभता आती है। यह भी माना जाता है कि इस दिन तिल के तेल में देवी लक्ष्मी का वास होता है और पानी देवी गंगा का वास होता है। इसलिए अभ्यंग स्नान करने से दोनों का ही आशीर्वाद प्राप्त होता है।
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