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    संसार का रहस्य क्या है

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    Updated: Wed, 25 Dec 2013 12:36 PM (IST)

    संसार अनोखा है, विचित्रताओं और विसंगतियों से परिपूर्ण है। अनेकानेक प्राणी, जीवधारी, जीवांश व जीवाणुओं से युक्त यह संसार विशेषताओं का वृहद स्वरूप है। इस पर चर्चा करने से कई ग्रंथों की रचना हो सकती है, लेकिन मौजूदा संदर्भ में चराचर जगत के उन नियामकों का प्रसंग उठा है कि इस संसार का सार क्या है? संसार का सार तो संसार वा

    संसार अनोखा है, विचित्रताओं और विसंगतियों से परिपूर्ण है। अनेकानेक प्राणी, जीवधारी, जीवांश व जीवाणुओं से युक्त यह संसार विशेषताओं का वृहद स्वरूप है। इस पर चर्चा करने से कई ग्रंथों की रचना हो सकती है, लेकिन मौजूदा संदर्भ में चराचर जगत के उन नियामकों का प्रसंग उठा है कि इस संसार का सार क्या है?

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    संसार का सार तो संसार वाले बता सकते हैं, इसमें क्या संदेह है? फिर भी अनेक संसारी जन अल्पज्ञ हो सकते हैं। हर राही को अपनी राह का पता हो, यह जरूरी नहीं। ऐसा लगता है कि पथिक अपना पथ भूल गया है, उसे कुछ भी याद नहीं। लोग अपना मार्ग नहीं जानते, तब भी वे संसार से बाहर के मार्र्गो की खोज में जुटे हैं। सूर्य-चंद्र और मंगल सहित अनेक ग्रहों के रास्तों को तलाशते हुए उन्हें स्वयं के लिए रास्ता नहीं सूझ रहा है। दूसरों को राह दिखाने वाले तो मिलेंगे, परंतु अपनी राह की सुध कम ही लोगों को है।

    सार से ही बना है संसार, यानी सार का विस्तार। सार जितना सुखद है, विस्तार उतना ही दुखद है। सार का भेद क्या है और संसार का रहस्य क्या है, इस विषय पर ठहरकर विचार करना चाहिए। जिस प्रकार ईश्वर ने मनुष्य को विशेष उद्देश्य के लिए पृथ्वी पर भेजा है, उसी तरह संसार की संरचना के पीछे प्रभु का मंतव्य ही प्रमुख है। सभी लोगों को इसे ही सार तत्व मानना चाहिए।

    भगवान की इच्छा से प्रकृति का जन्म हुआ है। वह ही संसार में चेतन तत्व के रूप में विराजमान हैं। इसलिए आत्मा से परमात्मा के मध्य सेतु को ही अपना रास्ता मानना चाहिए। आत्मतत्व या चेतना को समझने व अनुभव करने की विधियां अलग-अलग हो सकती हैं, फिर भी उनकी दिशा एक ही है। आत्मज्ञान ही सार तत्व है संसार का। आत्मज्ञान की अनुभूति होने पर व्यक्ति को यह पता चल जाता है कि इस संसार में शाश्वत क्या है, क्योंकि मानव शरीर और जड़ जगत नश्वर है। अनश्वर है तो सिर्फ आत्मा व परमात्व तत्व।

    देह के अंत के बाद आत्मा, परमात्मा में विलीन हो जाती है। यदि मन अपनी आत्मा में रमण करे तो नए संसार की रचना होगी, जिसके लिए मनुष्य धरती पर आया है। मन यदि साफ-सुथरा और उच्च विचारों वाला नहीं है तो फिर भौतिक प्रगति किसी काम की नहीं।

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