अहोई माता की पूजा में 8 कोष्ठक का क्या है राज? संतान की लंबी उम्र से जुड़ा है गहरा रहस्य
अहोई अष्टमी पूजा में बनाए जाने वाले 8 कोष्ठक और स्याहू के 7 पुत्रों का क्या है रहस्य? जानिए इसका ...और पढ़ें

अहोई माता की पूजा । (Picture Credit- AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। अहोई अष्टमी का व्रत हिंदू धर्म में संतान की सुख-समृद्धि, अच्छी सेहत और लंबी उम्र के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतान की खुशहाली के लिए निर्जला या फलाहार व्रत रखती हैं और शाम के समय अहोई माता की पूजा करती हैं।
पूजा के दौरान दीवार पर अहोई माता, स्याहू और उसके सात पुत्रों का चित्र बनाया जाता है। इसके साथ ही आठ कोष्ठक यानी छोटे-छोटे खाने भी बनाए जाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि पूजा में इन आठ कोष्ठकों को बनाने के पीछे क्या मान्यता है? आइए जानते हैं इसका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व।
आठ कोष्ठक का अष्टमी तिथि से संबंध
अहोई अष्टमी का व्रत हर साल कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। अष्टमी का अर्थ ही आठवीं तिथि होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पूजा के समय बनाए जाने वाले आठ कोष्ठक इसी अष्टमी तिथि का प्रतीक माने जाते हैं। इन आठ खानों के माध्यम से व्रत की तिथि और पूजा के महत्व को दर्शाया जाता है। मान्यता है कि इनको बनाकर महिलाएं अहोई माता के सामने अपनी संतान की रक्षा और सुखी जीवन की प्रार्थना करती हैं।
अहोई माता के आठ कोष्ठकों का आध्यात्मिक महत्व
अहोई अष्टमी की पूजा में आठ कोष्ठकों को शुभता और मंगल का प्रतीक भी माना जाता है। धार्मिक परंपराओं में आठ अंक को विशेष महत्व दिया गया है। इसे जीवन में सुख, समृद्धि, खुशहाली और पूर्णता से जोड़कर देखा जाता है। कुछ मान्यताओं में इन आठ कोष्ठकों को देवी शक्ति के विभिन्न स्वरूपों और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक भी माना जाता है।
स्याहू और उसके सात पुत्रों का महत्व
अहोई माता की पूजा में स्याहू यानी साही और उसके सात पुत्रों का चित्र भी बनाया जाता है। इसके पीछे अहोई अष्टमी से जुड़ी एक प्रचलित पौराणिक कथा है। कथा के अनुसार, एक साहूकार की पत्नी मिट्टी खोदते समय अनजाने में स्याहू के एक बच्चे को चोट पहुंचा देती है। इससे नाराज होकर स्याहू उसे संतान संबंधी कष्ट का श्राप देती है। बाद में महिला अपनी गलती का पश्चाताप करती है और स्याहू से क्षमा मांगती है। उसकी भक्ति और प्रार्थना से प्रसन्न होकर स्याहू उसे संतान सुख का आशीर्वाद देती है। इसी कथा की याद में अहोई माता की पूजा के समय स्याहू और उसके सात पुत्रों का चित्र बनाया जाता है। यह चित्र मातृत्व, क्षमा, करुणा और संतान की रक्षा का संदेश देता है।
अत: इन इन कोष्ठकों के माध्यम से महिलाएं अपने परिवार की खुशहाली और बच्चों के सुरक्षित भविष्य की प्रार्थना करती हैं। यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही धार्मिक आस्था और पारिवारिक संस्कारों को भी आगे बढ़ाती है।
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