Ahoi Ashtami 2026: संतान की लंबी उम्र के लिए रख रही हैं व्रत? ये 5 गलतियां कहीं पूजा का फल निष्फल न कर दें
अहोई अष्टमी (Ahoi Ashtami 2026) का व्रत संतान की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य के लिए कार्तिक कृष्ण अष्टमी ...और पढ़ें

अहोई अष्टमी के नियम और परंपराएं

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म विवाहित महिलाएं संतान और पति की दीर्घायु, खुशहाली और सुख-समृद्धि के लिए कई तरह के व्रतों का पालन करती हैं। इन्हीं में से एक व्रत 'अहोई अष्टमी' (Ahoi Ashtami 2026) का भी है, जो संतान की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अच्छी सेहत के लिए रखा जाता है।
यह पर्व हर साल कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर मनाया जाता है, जो दीवाली से ठीक आठ दिन पहले आता है। इस दिन माताएं निर्जला उपवास रखती हैं और संतान की कुशल मंगल कामना के लिए अहोई माता (जिन्हें देवी पार्वती का रूप माना जाता है) से प्रार्थना व उनकी पूजा करती हैं।
इस साल अहोई अष्टमी का व्रत 1 नवंबर 2026, रविवार के दिन रखा जाएगा। इस व्रत का संपूर्ण फल प्राप्त करने और संतान की खुशहाली के लिए माताओं को कुछ खास नियमों का पालन जरूर करना चाहिए।
अहोई अष्टमी का व्रत क्यों रखते हैं?
हिंदू धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, अहोई अष्टमी व्रत का संबंध खासतौर पर मां पार्वती से जोड़कर देखा जाता है, जिन्हें संतान की रक्षक देवी के रूप में भी पूजा जाता है। इस व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा बताती है कि, एक बार एक महिला जंगल में मिट्टी खोज रही थी और गलती से उसे साही के एक बच्चे को मार दिया। इस घटना के कुछ दिनों बाद ही महिला के अपने पुत्र की भी मौत हो गई।
इस बात से दुखी होकर महिला ने मां पार्वती की घोर तपस्या की। देवी पार्वती ने महिला को अहोई माता की पूजा और व्रत करने की सलाह दी। इस व्रत के प्रभाव से उसका पुत्र फिर जीवित हो उठा। तभी से यह व्रत संतान की लंबी आयु, सफलता और सुखी परिवार के उद्देश्य से रखा जाने लगा।

(Picture Credits- AI Images)
अहोई अष्टमी पर क्या करें?
अहोई अष्टमी (Ahoi Ashtami 2026) के मौके पर माता को अपनी संतान के कल्याण के लिए व्रत रखने के दौरान इन बातों का खास ध्यान रखना चाहिए।
सुबह सुर्योदय से पहले उठकर स्नान करना चाहिए और अपनी संतान की लंबी आयु और बेहतर स्वास्थ्य के लिए निर्जला व्रत रखने का संकल्प लेना चाहिए।
संध्याकाल में दीवार पर अहोई माता की छवि बनाकर उसकी पूजा-अर्चना करनी चाहिए। इसके अलावा साही और उसके बच्चों की भी पूजा करने की परंपरा है।
अहोई अष्टमी पूजा के दौरान अहोई माता की व्रत कथा पढ़ना अनिवार्य माना जाता है।
शाम को पूजा खत्म होने के बाद तारों को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करना चाहिए। करवा चौथ से विपरीत इस व्रत में चंद्रमा की जगह तारों को अर्घ्य दिया जाता है।
इस दिन ब्राह्मण भोज और जरूरतमंदों को दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। व्रत का पारण सात्विक भोजन से ही करना शुभ माना जाता है।
अहोई अष्टमी के नियम
अहोई अष्टमी के मौके पर माता को व्रत की पवित्रता बनाए रखने के लिए कुछ कामों को करने से बचना चाहिए।
इस दिन भूलकर भी चाकू, कैंची, सुई जैसी किसी भी तरह की नुकीली या धारदार वस्तु का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि इन वस्तुओं को हिंसात्मक और नकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है।
कहानी में महिला द्वारा मिट्टी खोदने के कारण हुई अनहोनी के वजह से इस दिन माता को मिट्टी से जुड़ा कोई भी काम करने से बचना चाहिए।
अहोई अष्टमी व्रत के दौरान दिन में सोना आलस्य और अशुभ माना जाता है, जो पूजा के प्रभाव को कम कर सकता है।
इस व्रत के दौरान बाल धोना या काटना दोनों ही वर्जित माना जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि यह सौभाग्य को प्रभावित कर सकता है।
अहोई अष्टमी के मौके पर पूरे दिन शांत और सात्विक रहना चाहिए। इस दिन किसी से भी झूठ बोलना या विवाद करना व्रत के नियमों के खिलाफ माना जाता है।
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