गुरू गोविंद ने प्रारंभ की परंपरा

भारत के प्रमुख त्योहार होली को गुरु गोविंद सिंह जी ने नए ढंग से मनाने की परंपरा आरंभ की थी। उन्होंने इस त्योहार को परमात्मा के प्रेम रंग में सराबोर कर अधिक आनंददायी स्वरूप दिया। श्री गुरुग्रंथ साहब में होली का उल्लेख करते हुए प्रभु के संग रंग खेलने की कल्पना की गई है। गुरुवाणी के अनुसार, परमात्मा के अनंत गुणों का गायन करते हुए प्रफुल्लता उत्पन्न होती है और मन महा आनंद से भर उठता है। जब मनुष्य होली को संतों की सेवा करते हुए मनाता है तो लाल रंग अधिक गहरा हो जाता है। गुरु गोविंद सिंह ने होली को आध्यात्मिकता के रंग में रंग दिया। उन्होंने इसे होला महल्ला का नाम दिया। 

क्‍या है अर्थ 

होला शब्द होली की सकारात्मकता का प्रतीक था और महल्ला का अर्थ उसे प्राप्त करने का पराक्रम। रंगों के त्योहार के आनंद को मुखर करने के लिए गुरु जी ने इसमें व्याप्त हो गई कई बुराइयों जैसे कीचड़ फेंकने, पानी डालने आदि का निषेध किया। होली के त्योहार का आयोजन इस तरह से किया जाने लगा कि पारस्परिक बंधुत्व और प्रेम की भावना दृढ़ हो। 

ऐसे मनाते हैं उत्‍सव

होला महल्ला का आरंभ प्रात: विशेष दीवान में गुरुवाणी के गायन से होता। इसके पश्चात कवि दरबार होता, जिसमें चुने हुए कवि अपनी कविताएं सुनाते। दोपहर बाद शारीरिक अभ्यास, खेल और पराक्रम के आयोजन होते। गुलाब के फूलों, गुलाब से बने रंगों की होली खेली जाती। दो दिनों तक चलने वाले इस उत्सव के दूसरे दिन छद्म युद्ध आयोजित किया जाता, जिसमें सिखों को दो दलों में बांट दिया जाता था। इसमें बिना किसी को शारीरिक क्षति पहुंचाए युद्ध के जौहर दिखाए जाते। इसके लिए गुरु गोबिंद सिंह जी ने खास तौर पर आनंदपुर साहिब में किला बनवाया था। किले में बैठकर वे स्वयं सिख दलों के युद्ध को देखते थे। योद्धाओं को उचित पुरस्कार दिए जाते थे। अंत में कड़ा प्रसाद वितरित होता। इस तरह होली का यह पुरातन त्योहार स्वस्थ प्रेरणाओं का उत्सव बन गया था।

आज भी जारी है परंपरा

गुरु जी के दरबार के जाने-माने कवि भाई नंद लाल जी ने आनंदपुर साहब की होली का वर्णन करते हुए लिखा कि सारा बाग सुगंधित हो उठा था। चारों ओर विभिन्न सुगंधों की वर्षा हो रही थी। सारे सिखों के वस्त्र केसर के छीटों से रंग गए थे। गुरु गोबिंद सिंह जी का उल्लेख करते हुए नंदलाल जी ने लिखा कि रंगों में रंगा हुआ उनका कुर्ता देखकर लग रहा था मानो सारी सृष्टि रंग गई हो। आनंदपुर में आज भी इसी परंपरा का निर्वाह किया जाता है। इसमें भाग लेने बड़ी संख्या में लोग आते हैं। 

By: डॉ. सत्येन्द्र पाल सिंह

Edited By: Molly Seth