शिव मंदिरों में होती है नवग्रह पूजा, लेकिन विष्णु मंदिरों में क्यों नहीं? वैष्णव परंपरा से जुड़ा है रहस्य
हर शिव मंदिर में अमूमन नवग्रहों की मूर्तियां होती हैं, लेकिन विष्णु मंदिरों में ऐसा नहीं होता। आइए जानते हैं इसके पीछे का पौराणिक और आध्यात्मिक कारण।

नवग्रह पूजा का क्या महत्व है? (AI-Generated image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। अक्सर जब हम किसी शिव मंदिर में दर्शन करने जाते हैं, तो वहां शिवलिंग के आसपास नवग्रहों (सूर्य, शनि, राहु-केतु आदि) का एक अलग मंडप जरूर दिखता है। भक्त शिव जी के साथ-साथ ग्रहों की भी पूजा करते हैं।
लेकिन, क्या आपने कभी इस बात पर गौर किया है कि भगवान राम, कृष्ण या विष्णु जी के मंदिरों में नवग्रह की मूर्तियां आमतौर पर नहीं होतीं? ऐसा क्यों आइए जानते हैं।
विष्णु मंदिरों में पूर्ण समर्पण का भाव
वैष्णव संप्रदाय का 'शरणागति' सिद्धांत इसकी सबसे मुख्य वजह माना जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा है,
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज'
इसका अर्थ है- सब कुछ छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ।
विष्णु भक्तों का अटूट विश्वास होता है कि जब उन्होंने सीधे पूरे ब्रह्मांड को पालने वाले परमेश्वर की ही शरण ले ली है, तो किसी ग्रह या नक्षत्र की अलग से पूजा करने की क्या जरूरत है। नवग्रह भी भगवान विष्णु की बनाई व्यवस्था के अधीन ही है। अगर किसी भक्त के सिर पर उसके श्रीहरि का हाथ है तो कोई भी ग्रह उसका बाल भी बांका नहीं कर सकता।
शिव मंदिरों में नवग्रह क्यों होते हैं?
दूसरी ओर भगवान शिव को 'महाकाल' कहा गया है। काल का मतलब है समय और समय ग्रहों की चाल से चलता है। शिव पुराण बताता है कि सभी नौ ग्रह महादेव के आदेश पर ही अपना काम करते हैं। शनि देव को भी भगवान शिव जी की घोर तपस्या के बाद ही कर्मों का फल देने वाले 'न्यायाधीश' का पद मिला है। यही वजह है कि ग्रहों की शांति और शनि या राहु के बुरे असर को खत्म करने के लिए शिव जी की पूजा के साथ नवग्रहों को भी शिव मंदिरों में स्थान दिया गया है।
दोनों देवों की भक्ति और उपाय का अंतर
इन दोनों जगहों की आध्यात्मिक ऊर्जा भी अलग होती है। शिव मंदिरों में अक्सर ग्रह दोषों (जैसे कालसर्प या साढ़ेसाती) के निवारण, तांत्रिक उपायों और साधनाओं पर फोकस होता है। जबकि, विष्णु मंदिरों का माहौल पूरी तरह से सात्विक होता है, जहां सिर्फ प्रेम, कीर्तन और मोक्ष की बात होती है।
वहीं, शिव के दरबार में भक्त भगवान के साथ ग्रहों को भी मना लेते हैं, जबकि हरि के दरबार में भक्त यह मानकर निश्चिंत हो जाते हैं कि उनके नारायण खुद ही सारे दोषों को शांत कर देंगे।
यह भी पढ़ें- अनंत चतुर्दशी पर पंचामृत में भगवान विष्णु को खोजने की परंपरा क्यों है? जानें इसके पीछे का पौराणिक रहस्य!
यह भी पढ़ें- रावण के पूर्व जन्म का वो सच जो सब नहीं जानते! इस एक श्राप ने विष्णु भक्त को बना दिया था राक्षस
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।
