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रावण के पूर्व जन्म का वो सच जो सब नहीं जानते! इस एक श्राप ने विष्णु भक्त को बना दिया था राक्षस

Published: Mon, 21 Sep 2026 06:35 PM (IST)

रामायण के अनुसार, लंकापति रावण अपने पूर्व जन्म में एक अत्यंत प्रतापी राजा थे, लेकिन अनजाने में उनसे एक बड़ी ...और पढ़ें

कैसे एक विष्णु भक्त ब्राह्मणों के श्राप से बना लंकापति राक्षस (Picture Credit: AI Generated)

कैसे एक विष्णु भक्त ब्राह्मणों के श्राप से बना लंकापति राक्षस (Picture Credit: AI Generated)

HighLights

  1. लंकापति रावण पूर्व जन्म में राजा प्रतापभानु थे।

  2. ब्राह्मणों के श्राप से विष्णु भक्त राक्षस बना।

  3. भगवान राम के हाथों रावण को मोक्ष मिला।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। जब भी बात रामायण की आती है, तो रावण का नाम सबसे पहले लिया जाता है। लंकापति, अद्भुत शक्तियों का ज्ञाता, सर्वशक्तिमान और अत्यंत बलशाली होने के कारण उन्हें आज भी एक योद्धा के रूप में याद किया जाता है।

रावण के बारे में आज भी यह कहा जाता है कि वह अत्यंत ज्ञानी था, लेकिन उसके अहंकार की वजह से उनका अंत हुआ बल्कि राम। सतयुग में रावण ने एक ब्राह्मण कुल में जन्म लिया, लेकिन उनकी माता कैकसी एक राक्षसी थीं, जिनके कारण वो राक्षसों का राजा बना।

अगर हम लंकापति रावण के पूर्वजन्म की बात करें, तो वह पिछले जन्म में राक्षस न होकर एक विष्णु भक्त था। रामचरित मानस में इस बात का वर्णन है कि रावण पूर्वजन्म से ही राक्षस नहीं था। आइए आपको बताते हैं लंकापति अपने पूर्व जन्म में क्या था और किस श्राप की वजह से वो राक्षस बना था।

पूर्वजन्म में कौन था लंकापति रावण?

रामचरित मानस में एक चौपाई में लिखा है कि रावण अपने पूर्व जन्म में कोई राक्षस नहीं था बल्कि वह भगवान विष्णु का सेवक था। प्राचीन समय में एक राजा था प्रतापभानु।

वह एक बड़ा धर्मात्मा राजा था जो हवन,यज्ञ, पूजा और सेवा में बहुत आगे था, लेकिन उसके भीतर मन में अंतर गहराइयों में संसार की वासना बसी हुई थी और वह अजर, अमर होना चाहता था। प्रताप भानु एक बार एक मृग के पीछे पड़ गया और वह मृग भटकाता हुआ जंगल में पहुंच गया।

वहां उन्हें एक कपट मुनि मिला, जिसका नाम था एकतन और उस कपट मुनि के वाक जाल में फंसकर प्रताप भानु ने अपने ही गुरु का अपहरण करवा लिया क्योंकि कपट मुनि ने उसे ऐसा कहा कि प्रताप भानु के गुरु ही उन्हें आगे बढ़ने से रोक रहे हैं। ऐसे में कपट मुनि ने गुरु को अपहरण करने की सलाह दी।

प्रतापभानु ने गुरु का अपहरण करवाया और कपट मुनि ने रसोई में अंदर जाकर के ब्राह्मणों के भोजन में मांस मिला दिया। इसका श्राप ब्राह्मणों ने प्रतापभानु को दिया और उसे अगले जन्म में राक्षस होने का श्राप दे दिया।

कैसे मिली प्रताप भानु को श्राप से मुक्ति

राजा प्रतापभानु को जब ब्राह्मणों से श्राप दिया तब वह स्तब्ध रह गए और उन्होंने अनजाने में हुई भूल की क्षमा ब्राह्मणों से मांगी। यह सुनकर ब्राह्मणों ने प्रतापभानु से कहा कि 'श्राप वापस नहीं लिया जा सकता है, लेकिन तुम निर्दोष हो, इसलिए राक्षस योनि में भी तुम्हारा बल-वैभव बहुत बड़ा होगा और स्वयं भगवान विष्णु मनुष्य रूप में आकर तुम्हारा वध करेंगे, जिससे तुम्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी।'

श्राप के प्रभाव से कुछ ही दिनों में पड़ोसी राजाओं ने प्रतापभानु के राज्य पर आक्रमण कर दिया। राजा प्रतापभानु और उनके भाई अरि मर्दन वीरता से लड़ते हुए युद्ध में मारे गए और राजा का पूरा वंश समाप्त हो गया। इस प्रकार प्रतापभानु और उनके परिवार ने अगले जन्म में राक्षस राज के रूप में जन्म लिया।

राजा प्रतापभानु लंकापति रावण बना और उनका छोटा भाई अरि मर्दन कुंभकर्ण बना। वहीं प्रतापभानु का बुद्धिमान मंत्री धर्मरुचि विभीषण के रूप में पैदा हुआ।

राम चरित मानस के बालकाण्ड के 153 वें दोहे में राजा प्रतापभानु का वर्णन विस्तार से मिलता है। इस बात का जिक्र भी है कि ब्राह्मणों के एक श्राप की वजह से ही धर्म परायण राजा अगले जन्म में लंकापति रावण बना और उसे विष्णु जी के अवतार के रूप में प्रभु श्री राम ने मोक्ष दिया।

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