चिंता और चिंतन - किसी एक बात को पकड़ कर लगातार दुखी होते रहना चिंता है और उसी प्रकरण को लेकर सही दिशा में सोचने की प्रक्रिया का नाम है चिंतन। चिंता भटकाव है, चिंतन रास्ता है। चिंता का समाधान सिर्फ चिंतन है। चिंता के दाह पर चिंतन चंदन का लेप है। आज के युग में हम सीमेंट, लोहे के बने मकानों में नहीं, चिंता के घर में सांस लेते हैं। सुबह जागने से लेकर सोने तक व्यापार में हानि-लाभ, संतान का पालन-पोषण, उनकी शिक्षा-दीक्षा, अपने और परिवार के स्वास्थ्य की चिंता नाना प्रकार की उलझनों में घिरे रहते हैं। जो मिल गया उसकी देखभाल और जो नहीं मिला, उसे पाने की ललक में जीवन जीना छोड़कर खोने और पाने की चिंता के भंवर में डूबते उतरते रहते हैं ।

इन सारी चिंताओं में डूबे रहने से हमारे आने वाले दुख में तो कभी कोई कमी नहीं होती लेकिन चिंताओं की चिंता करने से हमारे आज के सुख में, उल्लास में कटौती जरूर हो जाती है। चिंता मन को खोखला बना देती है, जबकि चिंतन जीवन को व्यवस्थित करना सिखाता है। अगर जीवन में चिंतायें अपरिहार्य हैं तो प्रकृति ने उनका निराकरण भी हमें दिया है।

हमारी श्रेष्ठता का सबसे बड़ा कारण यही है कि दूसरे जीव अपने-आपको बदल नहीं सकते। लेकिन हम इंसानों में अपने-आपको बदलने की क्षमता है। इसी विशेषता से हम अपनी चिंताओं को चिंतन में बदल सकते हैं। उनका समाधान खोज सकते हैं।

आइंस्टीन बचपन से ही बड़े सरल स्वभाव के थे। इस कारण उनके सहपाठी उनका उपहास उड़ाते और कभी-कभी उनकी पीठ पर बुद्धू भी लिख देते थे। एक बार उनके अध्यापक ने भी नाराज होकर कह दिया था कि तुम तो सात जन्म तक गणित नहीं सीख पाओगे। इसका उल्लेख करते समय आइंस्टीन यह भी कहते हैं कि मैंने इन बातों का न बुरा माना और न ही कभी इनको लेकर चिंतित हुआ। इसके विपरीत मैं दिन-रात कठोर परिश्रम में जुट गया कि मुझे वह सब कुछ बनना है जिनको लेकर बचपन में मुझे उपहास का पात्र बनना पड़ा। मैं सफल हुआ क्योंकि मैंने जीवन में चिंता या व्यथा को स्थान नहीं दिया। उसके बदले चिंतन की राह पकड़ी।

शरीर के हर अवयव का ट्रांसप्लांट संभव हो गया है, प्लास्टिक सर्जरी से चेहरा तक बदला जा सकता है। ऐसे में हम अपनी आध्यात्मिक शक्तियों को जाग्रत कर अपने सोच में बदलाव ला सकते हैं, ताकि समस्याओं की गंभीरता के ऊहापोह में न उलझ उनके समाधान पा सकें। हम अपनी पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक,परेशानियों की चिंता में गोष्ठियां, सम्मेलन तो खूब आयोजित करते हैं। लेकिन केवल चिंता तक ही सीमित रह जाते हैं। चिंतन कर निष्कर्षों पर अमल करना भूल जाते हैं। चिंता का यह कार्यक्रम एक तरफ अनवरत चलता रहता है दूसरी ओर समय का पोषण पाकर हमारी समस्याएं और अधिक सशक्त होकर हमें मुंह चिढ़ाती रहती हैं। चिंतन की आंख में चिंता के तिनके को प्रविष्टि देते ही हमारा सारा सुकून विलुप्त हो जाएगा। हमारे हर सुख में वह किरकरी बन कर खटकता रहेगा। हमारा उत्साह उस प्रेशर-कुकर की तरह होना चाहिए जिसके नीचे आग लगी होती है फिर भी आराम से सीटियां बजा कर अपना काम कर रहा होता है।

हमारे संबंधी तो मृत्यु उपरांत ही हमारी चिता के लिए लकडिय़ों को एकत्रित करते हैं लेकिन हम खुद भी जब तक जीवित रहते हैं हर एक छोटी बड़ी चिंता को अपनी ही चिता की एक लकड़ी की तरह एकत्रित करते रहते हैं। चिंता हमारी मनस्थिति में उस ट्रैफिक जाम की तरह है जो हमारे विचार, विवेक की गति को मंद कर देती है और हम उसमें फंसकर तिल-तिल अपनी ऊर्जा नष्ट करते हुए जीवन जीते हैं। चिंता करेंगे तो भटक जायेंगे, चिंतन करेंगे तो भटके हुए लोगों का मार्गदर्शन करेंगे। इसके लिए यह आवश्यक है कि चिंतन, मात्र चिंतन तक ही सीमित न रह जाये, धरातल पर उसके निष्कर्षों का क्रियान्वन भी हो।

                                                                                                                 - डा. निर्मल जैन

                                                                                                                   (पूर्व न्यायाधीश)

 

Edited By: Jeetesh Kumar