Tulsidas Jayanti 2022: सामाजिक सौहार्द के अमर गायक थे गोस्वामी तुलसीदास जी, एक क्लिक में पढ़ें उनके जीवन से जुड़ी खास बातें
Tulsidas Jayanti 2022 पारस्परिक प्रेम के अमर गायक संत शिरोमणि तुलसीदास जी का यह संदेश है कि समाज किसी भी युग का हो जब लोग एक-दूसरे को सम्मान देंगे स्नेह करेंगे एक-दूसरे के लिए सहयोगी बनने को उद्यत रहेंगे तभी रामराज्य की अवधारणा चरितार्थ हो सकेगी।

संतोष कुमार तिवारी। श्रीरामकथा को घर-घर तक सुलभ करने वाले संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी के जीवन से जुड़े ऐसे विविध प्रसंग हैं, जो किसी भी पातक से पातक प्राणिमात्र को नारायण का सान्निध्य सहजता से प्राप्त करा सकने में सक्षम हैं। परस्पर विरोधी परिस्थितियों का जिस जीवट के साथ तुलसीदास ने सामना किया, वह अपने आपमें अनूठा निदर्शन है। उस समय लाख उपेक्षाओं के बाद भी वे अग्रिम पंक्ति में रहे। हर युग में एक साधक तुलसी जैसा अवतरित होता है, जो दूर तक एक ऐसा उजाला करता है कि पीढिय़ां उसे अपना सर्वश्रेष्ठ अतीत कहकर आह्लादित हुए बिना नहीं रह सकतीं।
अपने द्वादश ग्रंथों में वे बड़ी गंभीरता से तत्कालीन समाज व लोकमत के माध्यम से मानवतावादी पथ तैयार करते हैं। विशेषकर जब उनके सामने शिव-शाक्त, द्वैत-अद्वैत, जीवनमुक्ति और विदेह मुक्ति, कर्म-ज्ञान और भक्ति, विद्या-अविद्या व माया आदि के द्वंद्व तथा जातीय विद्वेष आदि सामने आते हैं, ऐसे में वह श्रीराम धारा और पुष्टिमार्ग के मतैक्य की गहरी जड़ों के बीच स्थितप्रज्ञ होकर जनमानस को नई दिशा प्रदान करते हैं। वह पुरुषोत्तम श्रीराम को प्रेरणादायी रूप में प्रस्तुत करते हैं और उनके आचरण को स्वयं में उतारने का भक्ति मार्ग प्रदान करते हैं। इस मार्ग में रामराज्य है। न कहीं विद्वेष, न कटुता। परित: समरसता की सुगंध।
रामकथा के माध्यम से संत कवि तुलसी ने समाज को पारस्परिक संबंधों को दृढ़ता के सूत्र में पिरोया - सब नर करहिं परस्पर प्रीती। आपसी सद्भाव के बल पर लोकदर्शी संत तुलसी ने जनमानस के हृदय की धड़कन को पहचाना। तभी तो उन्होंने सर्वग्राही अवधी को उन्होंने अपनी काव्यभाषा बनाया। रामचरितमानस में वे छोटे और बड़े अथवा जातीय श्रेष्ठता के मिथक पर लिखते हैं :
करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ।
मनहुं लखन सब भेंट भई, प्रेम न हृदय समाइ।
पारस्परिक प्रेम के अमर गायक संत शिरोमणि तुलसीदास जी का यह संदेश है कि समाज किसी भी युग का हो, जब लोग एक-दूसरे को सम्मान देंगे, स्नेह करेंगे, एक-दूसरे के लिए सहयोगी बनने को उद्यत रहेंगे, तभी रामराज्य की अवधारणा चरितार्थ हो सकेगी। रामकथा के ऐसे विलक्षण संत कवि तुलसी ने श्रीरामचरितमानस के रूप में मात्र काव्य नहीं रचा, बल्कि जीवन-दर्शन का पूरा आख्यान रच दिया है। तभी तो अयोध्या प्रसाद हरिऔध ने लिखा है :
कविता करके तुलसी न लसे।
कविता लसी पा तुलसी की कला।
[रामकथा के अध्येता]
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