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सरयू तट पर राजा दशरथ ने क्यों करवाया था यज्ञ? रामायण में छिपी है इसके पीछे की असली वजह

Published: Tue, 06 Oct 2026 03:19 PM (IST)

राजा दशरथ ने संतान प्राप्ति की चिंता में गुरुओं की सलाह पर पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया, जिसका वर्णन रामायण के बालकांड ...और पढ़ें

संतान न होने से परेशान थे राजा दशरथ (Picture Credit: AI Generated)

संतान न होने से परेशान थे राजा दशरथ (Picture Credit: AI Generated)

HighLights

  1. राजा दशरथ ने संतान प्राप्ति हेतु पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया।

  2. श्रृंगी ऋषि के मार्गदर्शन में सरयू तट पर यज्ञ संपन्न हुआ।

  3. अग्निदेव ने दिव्य खीर दी, जिससे चार पुत्रों का जन्म हुआ।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। रामायण में कई ऐसे प्रसंग देखने को मिलते हैं, जिनका विशेष महत्व है। रामायण के बालकांड में एक ऐसा ही प्रसंग है, जिसमें अयोध्या के राजा दशरथ द्वारा यज्ञ करवाने का वर्णन किया गया है। रामायण के अनुसार, राजा दशरथ एक पराक्रमी राजा थे, लेकिन उनके जीवन में एक बड़ी चिंता यह थी कि उनकी कोई संतान नहीं थी। लंबे समय तक संतान न होने के कारण उन्हें अपने वंश और राज्य के भविष्य की चिंता सताती थी।

उन्हें इस बात की चिंता थी कि उनके बाद राजगद्दी कौन संभालेगा। जब उन्होंने पुत्र प्राप्ति के लिए गुरुओं, मंत्रियों तथा राजपुरोहितों से उपाय पूछा, तो उन्होंने एक विशेष सलाह दी, जिससे राजा दशरथ को पुत्रों की प्राप्ति हुई। आइए इस आर्टिकल में आपको रामायण के इस प्रसंग के बारे में विस्तार से बताते हैं।

राजा दशरथ की तीन रानियां थीं कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा। उम्र बढ़ने के साथ राजा दशरथ को यह चिंता सताने लगी कि उनके देहावसान के बाद राज्य का उत्तराधिकारी कौन होगा। इस स्थिति में दशरथ ने अपने गुरुओं, मंत्रियों तथा राजपुरोहितों से सलाह ली। सभी ने उन्हें पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ कराने की सलाह दी, जिसके बाद राजा ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराने का फैसला लिया।

श्रृंगी ऋषि के मार्गदर्शन पर हुआ पुत्रेष्टि यज्ञ

उन्होंने इस यज्ञ के लिए श्रृंगी ऋषि को आमंत्रित किया और उन्हीं के मार्गदर्शन में यह अनुष्ठान संपन्न हुआ। श्रृंगी ऋषि को तप, ज्ञान और ब्रह्मचर्य के लिए पूज्य माना जाता था। अयोध्या में सरयू नदी के उत्तरी तट पर इस यज्ञ का किया गया।

पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रकट हुए अग्निदेव

यज्ञ के दौरान अग्नि प्रज्वलित की गई और मंत्रों के जप द्वारा देवताओं का आह्वान किया गया। इसी बीच यज्ञ कुंड से अग्निदेव स्वयं प्रकट हुए। उनके हाथ में एक स्वर्णपात्र था, जिसमें दिव्य खीर थी। अग्निदेव ने कहा कि यह खीर पुत्र प्राप्ति के लिए प्रदान की जा रही है। राजा दशरथ ने यह खीर अपनी तीनों रानियों में वितरित कर दी। इसके फलस्वरूप, माता कौशल्या के गर्भ से भगवान श्री राम, कैकेयी से भरत और सुमित्रा से लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न का जन्म हुआ।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।