सप्तमं भवानी गौरी
वासंतिक नवरात्र में नौ गौरी के दर्शन-पूजन के क्रम में सप्तमी तिथि 17 अप्रैल [बुधवार] को भवानी गौरी के दर्शन-पूजन की मान्यता है। इनका मंदिर विश्वनाथ गली में अन्नपूर्णा मंदिर से सटे राममंदिर परिसर में है। नौ दुर्गा के दर्शन -पूजन के क्रम में सातवें दिन कालरात्रि देवी के दर्शन-पूजन की मान्यता है। इनका मंदिर कालिका गली में स्थित है।
वासंतिक नवरात्र में नौ गौरी के दर्शन-पूजन के क्रम में सप्तमी तिथि 17 अप्रैल [बुधवार] को भवानी गौरी के दर्शन-पूजन की मान्यता है। इनका मंदिर विश्वनाथ गली में अन्नपूर्णा मंदिर से सटे राममंदिर परिसर में है। नौ दुर्गा के दर्शन -पूजन के क्रम में सातवें दिन कालरात्रि देवी के दर्शन-पूजन की मान्यता है। इनका मंदिर कालिका गली में स्थित है।
भगवती के इस रूप में संहार की शक्ति है। मृत्यु अर्थात काल का विनाश करने की शक्ति भगवती में होने के कारण इनको कालरात्रि के रूप में पूजा गया है। कालस्यपि रात्रि समकाल रात्रि। अर्थात सबको मारने वाले काल की भी रात्रि यानि विनाशिका होने से उनका नाम कालरात्रि है। इनके शरीर का रंग एकदम काला है। सिर के बाल बिखरे हैं। गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है। इनके तीन नेत्र हैं। ये तीनों नेत्र ब्रह्मांड के सदृश्य गोल हैं। इनकी नासिका के श्वास-प्रश्वास से अग्नि की ज्वालाएं निकलती रहती हैं। इनका वाहन गर्दभ (गधा) है। ये ऊपर उठे हुए दाहिने हाथ की वरमुद्रा से सभी को वर प्रदान करती हैं। दाहिनी तरफ का नीचे वाला हाथ अभयमुद्रा में बायीं तरफ के ऊपर वाले हाथ में लोहे का कांटा तथा नीचे हाथ में खड्ग है।
काशी विश्वनाथ मंदिर के आचार्य पद्मश्री प्रो. देवी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार मां कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक है, लेकिन ये सदैव शुभ फल देने वाली हैं। सातवें दिन साधक का मन सहस्वार चक्र में स्थित रहता है। ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है। इस चक्र में साधक का मन पूर्णत: मां कालरात्रि के स्वरूप में अवस्थित रहता है।
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