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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Feb 19, 2019 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

संत रविदास की जयंती: पढें उनके कुछ दोहे आैर जानें अर्थ

By Molly SethEdited By:
Published: Tue, 19 Feb 2019 10:54 AM (IST)Updated: Tue, 19 Feb 2019 04:36 PM (IST)

आज प्रसिद्घ संत कवि रविदास की जयंती मनायी जायेगी जिनका जीवन आैर चरित्र उनके दोहों में एक उदाहरण बन कर सामने आता है।

संत रविदास की जयंती: पढें उनके कुछ दोहे आैर जानें अर्थ
संत रविदास की जयंती: पढें उनके कुछ दोहे आैर जानें अर्थ

वर्तमान दौर में भी सार्थक

संत रविदास का जीवन तो एक प्रेणना था ही जिसके चलते वे एक जूते गांठने वाले से संत की श्रेणी में पहुंच गए। उनका ये विकास उनके दोहों में भी दिखता है आैर उनके ये दोहे वर्तमान दौर में भी उतने ही प्रासंगिक है। आइये जानें उनके कुछ एेसे ही दोहों आैर उनके अर्थ के बारे में।

1- रविदास’ जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच,

नर कूँ नीच करि डारि है, ओछे करम की कीच

जिसका अर्थ है कि सिर्फ जन्म लेने से कोई नीच नही बन जाता है बल्कि इन्सान के कर्म ही उसे नीच बनाते हैं।

2- जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात,

रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात

 जिसका अर्थ है कि जिस प्रकार केले के तने को छिला जाये तो पत्ते के नीचे पत्ता फिर पत्ते के नीचे पत्ता और अंत में कुछ नही निकलता है आैर पूरा पेड़ खत्म हो जाता है ठीक उसी प्रकार इंसान भी जातियों में बांट दिया गया है इन जातियों के विभाजन से इन्सान तो अलग अलग बंट जाता है और इन अंत में इन्सान भी खत्म हो जाते है लेकिन यह जाति खत्म नही होती है इसलिए रविदास जी कहते है जब तक ये जाति खत्म नही होंगा तब तक इन्सान एक दूसरे से जुड़ नही सकता है या एक नही हो सकता है।

3- हरि-सा हीरा छांड कै, करै आन की आस

ते नर जमपुर जाहिंगे, सत भाषै रविदास

अर्थात हीरे से बहुमूल्य हरी यानि भगवान है उसको छोड़कर अन्य चीजो की आशा करने वालों को अवश्य ही नर्क जाना पड़ता है अर्थात प्रभु की भक्ति को छोडकर इधर उधर भटकना व्यर्थ है।

4- करम बंधन में बन्ध रहियो, फल की ना तज्जियो आस

कर्म मानुष का धर्म है, सत् भाखै रविदास

इसका अर्थ है कि हमे हमेशा अपने कर्म में लगे रहना चाहिए और कभी भी कर्म बदले मिलने वाले फल की आशा भी नही छोडनी चाहिए क्योंकि कर्म करना हमारा धर्म है तो फल पाना भी हमारा सौभाग्य है।

5- कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा

वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा

अर्थात राम, कृष्ण, हरी, ईश्वर, करीम, राघव सब एक ही परमेश्वर के अलग अलग नाम है वेद, कुरान, पुराण आदि सभी ग्रंथो में एक ही ईश्वर का गुणगान किया गया है, और सभी ईश्वर की भक्ति के लिए सदाचार का पाठ सिखाते हैं।

 

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