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    Ravana: जानें, क्यों असुरों को लंका नरेश दशानन रावण का बनना पड़ा मामा?

    By Pravin KumarEdited By: Pravin Kumar
    Updated: Thu, 31 Aug 2023 11:30 AM (IST)

    Ravana देवता तपोबल से अतिरिक्त बल प्राप्त कर और शक्तिशाली हो गए। यह सब देख असुर चिंतित हो गए। यह सोच सभी असुर अपने गुरु के पास पहुंचे। उन्हें अपनी आपबीती सुनाई। उस समय असुरों के गुरु ने कहा-देवता अमृत पान कर अमर हो चुके हैं। उन्हें हराना नामुमकिन है। अब एक ही शर्त पर उन्हें कोई हरा सकता है।

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    Ravana: जानें, क्यों असुरों को लंका नरेश दशानन रावण का बनना पड़ा मामा?

    नई दिल्ली, आध्यात्म डेस्क | Ravana: समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत का पान कर देवता अमर हो गए। वहीं, असुर ठगा हुआ महसूस करने लगे। तत्कालीन समय में देवताओं का पलड़ा लंबे समय तक भारी रहा। असुर खुद को असहाय महसूस करने लगे। वहीं, देवता तपोबल से अतिरिक्त बल प्राप्त कर और शक्तिशाली हो गए। यह सब देख असुर चिंतित हो गए।

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    यह सोच सभी असुर अपने गुरु के पास पहुंचे। उन्हें अपनी आपबीती सुनाई। उस समय असुरों के गुरु ने कहा-देवता अमृत पान कर अमर हो चुके हैं। उन्हें हराना अब नामुमकिन है। अब एक ही शर्त पर उन्हें कोई हरा सकता है। यह सुन असुर प्रसन्न हो गए।

    अपनी खुशी को ताक पर रख एक असुर ने पूछा-गुरुवार! कौन सी शर्त है? जल्द बताएं। देवताओं की खुशी से मेरा हृदय विदीर्ण हो रहा है। तब असुरों के गुरु बोले-अगर कोई श्रेष्ठ ब्राह्मण तुम्हारी मदद करता है, तो ये संभव है। ये सुन असुर फिर निराश हो उठे। एक असुर बोला-गुरुवर ऐसा उपाय बताएं, जो हो सकता है। आप ही बताओ, देवताओं से हमारी जमती नहीं है और ब्राह्मण तो देवताओं की पूजा करते हैं। भला, कोई ब्राह्मण हमारी मदद क्यों करेगा ?

    पृथ्वी लोक का कोई सामान्य ब्राह्मण भी हमारी मदद नहीं करेगा। अगर किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण के पास जाते हैं, तो वह अपने तपोबल से हमारा नाश कर देगा। वहीं, कमजोर ब्राह्मण के पास जाते हैं, तो यह देखकर देवता हमारा उपहास करेंगे। इससे तो हमारी कीर्ति पर कलंक लग जाएगा। आप कुछ और सोचिए। इस तरह तो काम बनता दिख नहीं रहा है।

    कुछ समय तक मंत्रणा करने के बाद असुरों के गुरु बोले-अगर हम अपनी कन्या का विवाह किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण से कर दें। तब यह कार्य संभव हो जाएगा। यह सुन एक असुर बोला- आपको लगता है कि कोई श्रेष्ठ ब्राह्मण हमारी कन्या को स्वीकार्य करेगा। अरे, वो सब पंडित हैं। उन्हें सब पता होता है कि आप किस मंशा से उन्हें मिल रहे हैं।

    उसी समय एक अन्य असुर बीच में रोककर बोला- गुरुवर! ये संभव है। सभी असुर सरसरी निगाहों से उस असुर को देखने लगे। तब असुर बोला-हम अपनी कन्या का दान कर देते हैं, तो श्रेष्ठ ब्राह्मण मना नहीं कर पाएगा।

    हम अपनी बहन या बेटी की शादी किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण से कर देते हैं। उसका पुत्र हमारा भांजा होगा, लेकिन श्रेष्ठ ब्राह्मण होगा। हम अपने साथ उसे रखेंगे। तमोगुणी बनाएंगे। असुरों वाली शिक्षा देंगे और भड़का कर भी रखेंगे कि उसकी माता के साथ गलत हुआ है। देवताओं ने छल कर उसकी माता को प्राप्त किया। इस तरह भांजा अपने पक्ष में रहेगा। जब वह परम शक्तिशाली हो जाएगा। उस समय देवताओं से लड़ा देंगे और खुद भी लड़ लेंगे।

    उसी समय एक अन्य असुर बोला-विवाह, शादी, कन्यादान ये सब देवता करते हैं। हम लोग करते नहीं हैं। ये देवताओं का रिवाज हम नहीं करेंगे। इसी समय सभी असुर के विचारों में मतभेद हो गया। सभी असुर दो गुटों में बंट गए। यह देख असुरों के गुरु ने कहा-अब इस विषय को अल्पकालीन विश्राम देते हैं। अगले दिन पुनः मंथन करेंगे।

    गुरु की आज्ञा मान सभी असुर अपने आवास पर चले गए। रात्रि विश्राम के समय एक असुर बहुत चिंतित था। वह सोने के समय बार-बार करवटें बदल रहा था। यह देख असुर की पत्नी बोली-क्या बात है ? आप बड़े चिंतित है? तब असुर बोला-पुत्री की शादी किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण से करने की सोच रहा हूं, पर कोई योग्य ब्राह्मण मिल नहीं रहा है। अगर मिल भी जाए, तो क्या वह सहमत होगा? यह सब सोच चिंतित हूं।

    माता-पिता की बात असुर की पुत्री भी सुन रही थी। उस समय असुर की पुत्री कैकसी अपने पिता से बोली-आप चिंता न करें। वन में ही श्रेष्ठ ब्राह्मण विश्रवा रहते हैं। वे अपने शिष्यों को अध्ययन कराते हैं। वे परम ज्ञानी भी हैं। मैंने कई बार उनकी बातें छुप-छुप कर सुनी है। आप यह कार्य मुझ पर छोड़ दें। मैं उनके पास जाऊंगी और विनती करूंगी कि वो मुझे अपने आश्रम में स्थान दें। पुत्री कैकसी की बात सुन बेहद प्रसन्न होकर असुर बोला-तुम ब्रह्मांड की सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति से शादी करने जा रही हो। तुम भाग्यशाली हो। कल इस विषय पर चर्चा होगी। उसके बाद मैं तुम्हें अपना निर्णय बताऊंगा।

    अगले दिन कैकसी के पिता के प्रस्ताव को गुरु समेत सभी असुरों ने स्वीकार्य कर लिया। कैकसी अपने प्रयोजन में सफल रहीं। उस समय कैकसी, ब्रह्मा जी के मानस पुत्र, महर्षि पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा के पास पहुंची और उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार करने की बात की। महर्षि पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा इस प्रस्ताव को ठुकरा न सके। इसके पश्चात, कैकसी आश्रम में रहने लगी। सेवा भाव से कैकसी ने महर्षि पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा का हृदय जीत लिया। एक दिन महर्षि पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा ने कैकसी को वर मांगने को कहा। उस समय कैकसी ने अद्भुत और सबसे शक्तिशाली पुत्र रत्न प्राप्ति की मांग की। ऋषि विश्रवा ने कैकसी को वर दे दिया। कालांतर में कैकसी के गर्भ से दशानन रावण का जन्म हुआ। असुरों को उनके प्रयोजन में सफलता मिली।

    डिसक्लेमर-'इस लेख में निहित किसी भी जानकारी/सामग्री/गणना की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है, इसके उपयोगकर्ता इसे महज सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त, इसके किसी भी उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी।