Ravan story: क्यों दशानन रावण को मुक्ति से पहले लेना पड़ा था तीन बार जन्म? पढ़ें रोचक कथा
आपको जानकर हैरानी होगी कि अपने पूर्व जन्म में रावण (Ravan previous birth) कोई राक्षस नहीं था बल्कि भगवान विष्णु का एक सेवक था। कथा के अनुसार एक श्राप के कारण रावण को राक्षस योनी में जन्म लेना पड़ा था। चलिए पढ़ते हैं रावण की पूर्वजन्म से जुड़ी कथा और जानते हैं कि किस प्रकार रावण को श्राप से मुक्ति मिली थी।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। दशानन रावण की गिनती, शक्तिशाली योद्धाओं और प्रकांड पंडितों में की जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि रावण पूर्व जन्म (Ravan's past life) में कौन था। रावण की पूर्वजन्म की कथा को लेकर कहा जाता है कि मुक्ति के लिए रावण को तीन जन्म लेने पड़े थे।
क्यों मिला था श्राप
श्रीमद्भागवत पुराण में वर्णन मिलता है कि रावण अपने पूर्व जन्म में भगवान विष्णु के बैकुंठ धाम में द्वारपाल था। यहां रावण का नाम जय था। उसी के साथ एक विजय नाम का भी द्वारपाल था। कथा के अनुसार, एक बार सनक, सनंदन आदि ऋषि मुनि, श्री हरि विष्णु के दर्शन करने पंहुचे। लेकिन जय विजय ने उन्हें द्वार पर ही रोक लिया और कहा कि अभी प्रभु अंदर विश्राम कर रहे हैं।
यह सुनकर ऋषिगण बहुत क्रोधित हो गए और उन्हें श्राप दिया कि तुम दोनों अगले जन्म में राक्षस के रूप में जन्म लोगे। यह सुनते ही दोनों द्वारपाल ऋषि मुनियों से क्षमा याचना करने लगे। इस पर ऋषिगण कहते हैं कि हमारा श्राप खाली नहीं जा सकता, लेकिन तुम 3 जन्मों तक राक्षस योनि में जन्म लोगे और हर जन्म में तुम्हारी मृत्यु विष्णु जी के अवतार के हाथों होगी, तब जाकर तुम्हें इस श्राप से मुक्ति मिलेगी
पहले जन्म की कथा
श्राप के अनुसार, जय-विजय का पहला जन्म में हिरण्यकश्यप व हिरण्याक्ष नामक दैत्यों के रूप में हुआ। एक बार जब हिरण्याक्ष ने धरती को समुद्र में छिपा दिया था, तब भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर उसका वध किया और धरती को पुनः:अपने स्थान पर स्थापित किया। वहीं उसके भाई हिरण्यकशिपु का वध भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार ने किया।
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किस रूप में हुआ दूसरा जन्म
जय-विजय का दूसरा जन्म में रावण और कुंभकर्ण के रूप में हुआ। रावण ने माता सीता का हरण किया था। तब प्रभु श्री हरि के 7वें अवतार भगवान श्री राम में रावण और कुंभकर्ण का वध किया।
तीसरा जन्म में ऐसे मिली मुक्ति
कथा के अनुसार, जय-विजय का तीसरा और आखिरी जन्म शिशुपाल व दंतवक्र के रूप में हुआ। दोनों ही भगवान श्रीकृष्ण की बुआ के पुत्र थे। इनकी बुराइयों के चलते इन्हें इस जन्म में भगवान विष्णु के 8वें अवतार भगवान श्रीकृष्ण के हाथों इन्हें मृत्यु की प्राप्ति हुई।
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