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    Radha Ashtami पर पूजा के समय करें इस चमत्कारी स्तोत्र का पाठ, मिलेगा मनचाहा वरदान

    Updated: Fri, 29 Aug 2025 09:00 PM (IST)

    राधा अष्टमी के दिन मंदिरों में जगत की देवी श्रीराधा रानी की विशेष पूजा की जाती है। इस शुभ अवसर पर प्रातः काल से भक्तजन राधा रानी की पूजा और भक्ति करते हैं। राधा अष्टमी (Radha Ashtami 2025 Importance) के दिन दान करने से साधक को अक्षय फल की प्राप्ति होती है।

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    Radha Ashtami 2025: राधा अष्टमी का धार्मिक महत्व

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। वैदिक पंचांग के अनुसार, रविवार 31 सितंबर को राधा अष्टमी मनाई जाएगी। यह पर्व हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन श्रीराधा रानी संग भगवान कृष्ण की पूजा की जाती है। साथ ही उनके निमित्त व्रत रखा जाता है। इस व्रत को करने से साधक पर राधा रानी की कृपा बरसती है।

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    अगर आप भी श्रीजी की कृपा पाना चाहते हैं, तो राधा अष्टमी के दिन भक्ति भाव से राधा रानी की पूजा करें। साथ ही पूजा के समय राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र का पाठ करें। इस स्तोत्र के पाठ से साधक की हर मनोकामना पूरी होती है।

    श्री राधा कपाट स्तोत्र

    मुनीन्दवृन्दवन्दिते त्रिलोकशोकहारिणी,

    प्रसन्नवक्त्रपंकजे निकंजभूविलासिनी।

    व्रजेन्दभानुनन्दिनी व्रजेन्द सूनुसंगते,

    कदा करिष्यसीह मां कृपा कटाक्ष भाजनम्॥

    अशोकवृक्ष वल्लरी वितानमण्डपस्थिते,

    प्रवालज्वालपल्लव प्रभारूणाङि्घ् कोमले।

    वराभयस्फुरत्करे प्रभूतसम्पदालये,

    कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥

    अनंगरंगमंगल प्रसंगभंगुरभ्रुवां,

    सुविभ्रमं ससम्भ्रमं दृगन्तबाणपातनैः।

    निरन्तरं वशीकृत प्रतीतनन्दनन्दने,

    कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥

    तड़ित्सुवर्ण चम्पक प्रदीप्तगौरविग्रहे,

    मुखप्रभा परास्त-कोटि शारदेन्दुमण्ङले।

    विचित्रचित्र-संचरच्चकोरशाव लोचने,

    कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष भाजनम्॥

    मदोन्मदाति यौवने प्रमोद मानमण्डिते,

    प्रियानुरागरंजिते कलाविलासपणि्डते।

    अनन्य धन्यकुंजराज कामकेलिकोविदे,

    कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥

    अशेषहावभाव धीरहीर हार भूषिते,

    प्रभूतशातकुम्भकुम्भ कुमि्भकुम्भसुस्तनी।

    प्रशस्तमंदहास्यचूर्ण पूर्ण सौख्यसागरे,

    कदा करिष्यसीह मां कृपा कटाक्ष भाजनम्॥

    मृणाल वालवल्लरी तरंग रंग दोर्लते ,

    लताग्रलास्यलोलनील लोचनावलोकने।

    ललल्लुलमि्लन्मनोज्ञ मुग्ध मोहनाश्रिते

    कदा करिष्यसीह मां कृपा कटाक्ष भाजनम्॥

    सुवर्ण्मालिकांचिते त्रिरेख कम्बुकण्ठगे,

    त्रिसुत्रमंगलीगुण त्रिरत्नदीप्ति दीधिते।

    सलोल नीलकुन्तले प्रसूनगुच्छगुम्फिते,

    कदा करिष्यसीह मां कृपा कटाक्ष भाजनम्॥

    नितम्बबिम्बलम्बमान पुष्पमेखलागुण,

    प्रशस्तरत्नकिंकणी कलापमध्यमंजुले।

    करीन्द्रशुण्डदण्डिका वरोहसोभगोरुके,

    कदा करिष्यसीह मां कृपा कटाक्ष भाजनम्॥

    अनेकमन्त्रनादमंजु नूपुरारवस्खलत्,

    समाजराजहंसवंश निक्वणाति गौरवे,

    विलोलहेमवल्लरी विडमि्बचारू चक्रमे,

    कदा करिष्यसीह मां कृपा कटाक्ष भाजनम्॥

    अनन्तकोटिविष्णुलोक नम्र पदम जार्चिते,

    हिमद्रिजा पुलोमजा-विरंचिजावरप्रदे।

    अपार सिद्धिऋद्धि दिग्ध -सत्पदांगुलीनखे,

    कदा करिष्यसीह मां कृपा कटाक्ष भाजनम्॥

    मखेश्वरी क्रियेश्वरी स्वधेश्वरी सुरेश्वरी,

    त्रिवेदभारतीश्वरी प्रमाणशासनेश्वरी।

    रमेश्वरी क्षमेश्वरी प्रमोदकाननेश्वरी,

    ब्रजेश्वरी ब्रजाधिपे श्रीराधिके नमोस्तुते॥

    इतीदमतभुतस्तवं निशम्य भानुननि्दनी,

    करोतु संततं जनं कृपाकटाक्ष भाजनम्।

    भवेत्तादैव संचित-त्रिरूपकर्मनाशनं,

    लभेत्तादब्रजेन्द्रसूनु मण्डल प्रवेशनम्॥

    राकायां च सिताष्टम्यां दशम्यां च विशुद्धधीः ।

    एकादश्यां त्रयोदश्यां यः पठेत्साधकः सुधीः ॥

    यं यं कामयते कामं तं तमाप्नोति साधकः ।

    राधाकृपाकटाक्षेण भक्तिःस्यात् प्रेमलक्षणा ॥

    ऊरुदघ्ने नाभिदघ्ने हृद्दघ्ने कण्ठदघ्नके ।

    राधाकुण्डजले स्थिता यः पठेत् साधकः शतम् ॥

    तस्य सर्वार्थ सिद्धिः स्याद् वाक्सामर्थ्यं तथा लभेत् ।

    ऐश्वर्यं च लभेत् साक्षाद्दृशा पश्यति राधिकाम् ॥

    तेन स तत्क्षणादेव तुष्टा दत्ते महावरम् ।

    येन पश्यति नेत्राभ्यां तत् प्रियं श्यामसुन्दरम् ॥

    नित्यलीला–प्रवेशं च ददाति श्री-व्रजाधिपः ।

    अतः परतरं प्रार्थ्यं वैष्णवस्य न विद्यते ॥

    राधा कृष्ण अष्टकम

    चथुर मुखाधि संस्थुथं, समास्थ स्थ्वथोनुथं ।

    हलौधधि सयुथं, नमामि रधिकधिपं ॥

    भकाधि दैथ्य कालकं, सगोपगोपिपलकं ।

    मनोहरसि थालकं, नमामि रधिकधिपं ॥

    सुरेन्द्र गर्व बन्जनं, विरिञ्चि मोह बन्जनं ।

    वृजङ्ग ननु रञ्जनं, नमामि रधिकधिपं ॥

    मयूर पिञ्च मण्डनं, गजेन्द्र दण्ड गन्दनं ।

    नृशंस कंस दण्डनं, नमामि रधिकधिपं ॥

    प्रदथ विप्रदरकं, सुधमधम कारकं ।

    सुरद्रुमपःअरकं, नमामि रधिकधिपं ॥

    दानन्जय जयपाहं, महा चमूक्षयवाहं ।

    इथमहव्यधपहम्, नमामि रधिकधिपं

    मुनीन्द्र सप करणं, यदुप्रजप हरिणं ।

    धरभरवत्हरणं, नमामि रधिकधिपं ॥

    सुवृक्ष मूल सयिनं, मृगारि मोक्षधयिनं ।

    श्र्वकीयधमययिनम्, नमामि रधिकधिपं ॥

    राधा कृष्ण स्तोत्र

    वन्दे नवघनश्यामं पीतकौशेयवाससम् ।

    सानन्दं सुन्दरं शुद्धं श्रीकृष्णं प्रकृतेः परम् ॥

    राधेशं राधिकाप्राणवल्लभं वल्लवीसुतम् ।

    राधासेवितपादाब्जं राधावक्षस्थलस्थितम् ॥

    राधानुगं राधिकेष्टं राधापहृतमानसम् ।

    राधाधारं भवाधारं सर्वाधारं नमामि तम् ॥

    राधाहृत्पद्ममध्ये च वसन्तं सन्ततं शुभम् ।

    राधासहचरं शश्वत् राधाज्ञापरिपालकम् ॥

    ध्यायन्ते योगिनो योगान् सिद्धाः सिद्धेश्वराश्च यम् ।

    तं ध्यायेत् सततं शुद्धं भगवन्तं सनातनम् ॥

    निर्लिप्तं च निरीहं च परमात्मानमीश्वरम् ।

    नित्यं सत्यं च परमं भगवन्तं सनातनम् ॥

    यः सृष्टेरादिभूतं च सर्वबीजं परात्परम् ।

    योगिनस्तं प्रपद्यन्ते भगवन्तं सनातनम् ॥

    बीजं नानावताराणां सर्वकारणकारणम् ।

    वेदवेद्यं वेदबीजं वेदकारणकारणम् ॥

    योगिनस्तं प्रपद्यन्ते भगवन्तं सनातनम् ।

    गन्धर्वेण कृतं स्तोत्रं यः पठेत् प्रयतः शुचिः ।

    इहैव जीवन्मुक्तश्च परं याति परां गतिम् ॥

    हरिभक्तिं हरेर्दास्यं गोलोकं च निरामयम् ।

    पार्षदप्रवरत्वं च लभते नात्र संशयः ॥

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