Pitru Paksha 2026: आज से शुरू हुए श्राद्ध, तर्पण से दान तक... नोट करें 15 दिनों के जरूरी नियम और सावधानियां
26 सितंबर 2026 से पितृपक्ष की शुरुआत हो रही है। जानिए इन 15 दिनों में तर्पण और श्राद्ध के दौरान ...और पढ़ें

पितृपक्ष के नियम और सावधानियां (AI-Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। 26 सितंबर 2026 यानी आज से पितृपक्ष की शुरुआत हो रही है। हिंदू धर्म में ये 15 दिन बेहद खास होते हैं, क्योंकि मान्यता है कि इस दौरान हमारे पूर्वज धरती पर अपने परिवारों के बीच आते हैं। अपने पितरों का आशीर्वाद पाने और उनकी आत्मा की शांति के लिए इन दिनों तर्पण और पिंडदान करने का विधान है।
लेकिन, श्राद्ध कर्म तभी पूरी तरह सफल माना जाता है, जब इसे सही नियमों और श्रद्धा के साथ किया जाए। आइए इस आर्टिकल में आज से शुरू होने वाले 15 दिनों में आपको किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, सबकुछ जानते हैं।
श्राद्ध में खान-पान और पारिवारिक परंपरा (कुलाचार)
पितृपक्ष (Pitru Paksha 2026) में भोजन की शुद्धता का बहुत महत्व है। इन 15 दिनों तक घर में सात्विक खाना (बिना प्याज-लहसुन वाला) ही बनना चाहिए। दाल, चावल, हरी सब्जियां और सादा भोजन उत्तम माना गया है। मांस-मदिरा और ज्यादा तीखे-मसालेदार खाने से पूरी तरह दूरी बना लें। श्राद्ध के भोजन में दूध, घी, शहद, जौ और तिल का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए। खाना पकाने वाले व्यक्ति को हमेशा नहा-धोकर और पूरी साफ-सफाई के साथ ही किचन के अंदर जाना चाहिए।
हालांकि, भारत में हर परिवार की अपनी अलग परंपराएं (कुलाचार) होती है। जैसे बंगाल, असम या दक्षिण भारत के कई हिस्सों में परिवार के नियमों के अनुसार पितरों को उनका पसंदीदा मांसाहारी भोजन या मछली अर्पित करने की भी प्रथा है, क्योंकि माना जाता है कि जो उन्हें जीवित रहते पसंद था, वही उन्हें श्राद्ध में दिया जाना चाहिए।
श्राद्ध करने का सही समय और जगह
तर्पण या श्राद्ध हमेशा दोपहर के समय ही करना चाहिए। यह कर्म कभी भी सूर्यास्त के दौरान न करें। पूजा करते समय अपना मुंह हमेशा दक्षिण दिशा की ओर रखें, क्योंकि इसे पितरों की दिशा माना जाता है। एक बात का खास ख्याल रखें कि श्राद्ध हमेशा अपनी जमीन, किसी मंदिर या पवित्र नदी के किनारे ही करें।
किसी दूसरे के घर पर श्राद्ध कर्म करना सही नहीं माना जाता। तर्पण करते समय काले तिल और 'कुशा' (एक पवित्र घास) का इस्तेमाल करना बेहद जरूरी माना जाता है।
क्या है ब्राह्मण भोज और पंचबली का महत्व?
श्राद्ध वाले दिन कम से कम 3 ब्राह्मणों को घर बुलाकर पूरे सम्मान के साथ सात्विक भोजन कराएं। उन्हें दान-दक्षिणा (कपड़े या अनाज) देकर ही विदा करें, क्योंकि बिना दान के श्राद्ध अधूरा रहता है। इसके अलावा, भोजन का एक हिस्सा देवताओं, गाय, कुत्ते, कौवे और चींटियों के लिए जरूर निकालें। इसे पंचबली कहते हैं, जो पितरों तक खाना पहुंचाने का जरिया माना जाता है।
इन 15 दिनों में क्या न करें?
पितृपक्ष के दौरान बाल, दाढ़ी और नाखून कटवाने से सख्त परहेज करना चाहिए। यह समय नई शुरुआत का नहीं होता, इसलिए कोई भी मांगलिक काम (शादी, मुंडन, गृह प्रवेश), नई खरीदारी या बड़ी यात्राएं टाल देनी चाहिए। घर का माहौल एकदम शांत रखें। क्लेश, लड़ाई-झगड़े और गुस्से से पितर निराश होकर वापस लौट जाते हैं।
वास्तु से जुड़ी जरूरी बातें
अक्सर लोग श्रद्धा में पूर्वजों की फोटो मंदिर, बेडरूम या घर के बीचों-बीच लगा देते हैं, जो वास्तु के हिसाब से गलत माना जाता है। पूर्वजों की तस्वीर हमेशा घर की दक्षिण या दक्षिण-पश्चिम दीवार पर ही लगानी चाहिए। साथ ही, इन 16 दिनों तक रोज शाम ढलने के बाद मेन गेट पर दक्षिण की तरफ मुंह करके सरसों या तिल के तेल का एक दीया जरूर जलाएं।
पितृपक्ष की पूजा करते समय पढ़ें ये 10 मंत्र
1. ॐ पितृ देवतायै नम:
2. ॐ पितृ गणाय विद्महे जगतधारिणे धीमहि तन्नो पित्रो प्रचोदयात्।
3. ॐ देवताभ्य: पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च
नम: स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नम:
4. ॐ देवताभ्य: पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।
नम: स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नम:।
5. ॐ आद्य-भूताय विद्महे सर्व-सेव्याय धीमहि।
शिव-शक्ति-स्वरूपेण पितृ-देव प्रचोदयात्।
6. गोत्रे अस्मतपिता (पितरों का नाम) शर्मा वसुरूपत् तृप्यतमिदं तिलोदकम
गंगा जलं वा तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः।
7. गोत्रे अस्मतपिता (पिता का नाम) शर्मा वसुरूपत् तृप्यतमिदं तिलोदकम
गंगा जलं वा तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः।
8. गोत्रे मां (माता का नाम) देवी वसुरूपास्त् तृप्यतमिदं तिलोदकम
गंगा जल वा तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः"
9. ॐ महादेवाय विद्महे रुद्रमूर्तये धीमहि तन्नः शिवः प्रचोदयात्॥
10. त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
पितृ पक्ष में क्या करना चाहिए?
इन 15 दिनों की अवधि में मन, कर्म और वचन से सात्विकता और ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए रोजाना कुशा और काले तिल के जल से पितरों का नियमित तर्पण करना चाहिए। पूर्वजों की मृत्यु तिथि आने पर दोपहर के समय विधि-विधान से श्राद्ध और पिंडदान करें।
इसके बाद, किसी ब्राह्मण को घर बुलाकर सम्मान के साथ सात्विक भोजन कराएं और अपनी क्षमता के हिसाब से अनाज, कपड़े या दक्षिणा का दान करें। इस दौरान घर के दरवाजे पर आए किसी भी पशु, पक्षी या असहाय व्यक्ति को खाली हाथ न लौटाएं। मान्यता है कि पितर किसी भी रूप में आ सकते हैं और आशीर्वाद दे सकते हैं।
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