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    पांडु की दूसरी पत्नी माद्री पांडु के मरने के बाद उनके साथ ही सती हो गईं थीं

    By Preeti jhaEdited By:
    Updated: Tue, 09 Feb 2016 04:31 PM (IST)

    शल्य, माद्री के भाई थे, नकुल और सहदेव उनके भानजे थे। लेकिन महाभारत के युद्ध में उन्होंने कौरवों का साथ दिया था। इस बात का उल्लेख महाभारत के शल्य पर्व के ह्दय प्रवेश पर्व और गदा पर्व में मिलता है।

    शल्य, माद्री के भाई थे, नकुल और सहदेव उनके भानजे थे। लेकिन महाभारत के युद्ध में उन्होंने कौरवों का साथ दिया था। इस बात का उल्लेख महाभारत के शल्य पर्व के ह्दय प्रवेश पर्व और गदा पर्व में मिलता है।

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    दरअसल दुर्योधन ने छल से शल्य को अपनी तरफ से युद्ध करने के लिए राजी किया था। महाभारत युद्ध में शल्य कर्ण के सारथी ( रथ चलाने वाला व्यक्ति) थे। जब कर्ण की मृत्यु हो गई तब महाभारत के अंतिम दिनों में शल्य ने कौरवों के सेनापति बन कर सेना का नेतृत्व संभाला था।

    लेकिन जिस दिन शल्य ने सेना का नेतृत्व संभाला, उसी दिन उनकी मृत्यु धर्मराज युधिष्ठिर के द्वारा हो गई थी। रिश्ते में नकुल और सहदेव युधिष्ठिर के भाई थे और शल्य उनके मामा तो शल्य युधिष्ठिर के भी मामा थे।

    शल्य की बहन माद्री, पांडु की दूसरी पत्नी थीं। जोकि पांडु के मरने के बाद उनके साथ ही सती हो गईं थीं। लेकिन उनके पीछे दो पुत्र नकुल और सहदेव को छोड़ गईं थीं। जिनका लालन-पालन पांडु की पहली पत्नी कुंती ने किया था।

    दुर्योधन ने कैसे ऐसे किया था छल

    दरअसल हुआ यूं था कि जब महाभारत युद्ध शल्य अपनी विशाल सेना लेकर अपने भांजों पांडवों के पास जा रहे थे, तब रास्ते में पहुंच कर दुर्योधन ने उनका अतिथि सत्कार किया। इसके फलस्वरूप शल्य दुर्योधन से प्रसन्न हो गए। तब उन्होंने दुर्योधन को वचन देने की इच्छा जताई, लेकिन दुर्योधन ने कहा, 'मामाश्री शल्य आप कौरवों की तरफ हमारे सेनापति कर्ण के महारथी पद को स्वीकार करें।'

    शल्य को यह बिल्कुल भी ठीक नहीं लगा। क्योंकि वह पांडवों की तरफ से लड़ना चाहते थे? लेकिन उन्होंने वचन दिया था, इसलिए वह अपने वचन का मान रखने के लिए दुर्योधन के साथ कौरवों की सेना में शामिल हुए थे। इस तरह दुर्योधन ने छल किया था।

    शल्य हुए तैयार लेकिन रखी एक शर्त

    अब शल्य कौरवों के महारथियों के बीच उपस्थित थे, कर्ण के सेनापति बनने के लिए तैयार तो हो गए, लेकिन उन्होंने दुर्योधन के सामने एक शर्त रखी।

    शर्त यह थी कि उन्हें कर्ण के सामने अपनी स्वेच्छा से रथ चलाने और बोलने की स्वतंत्रता दी जाए। कर्ण को यह बात अच्छी नहीं लगी फिर भी दुर्योधन और कर्ण ने शल्य की यह शर्त मान ली थी।