इलाहाबाद। आजादी के बाद से संविधान निर्माताओं ने संस्कृत के प्रति पूरा आदर प्रदर्शित किया। देश के सभी सर्वोच्च संस्थाओं ने संस्कृत के सुभाषितों को ही अपने आदर्श वाक्य या सूत्रवाक्य के रूप में अपनाया। हालात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आजादी के बाद भारत सरकार का सूत्रवाक्य बना 'सत्यमेव जयतेÓ।

लोकसभा का धर्मचक्र प्रवर्तनाय, सर्वोच्च न्यायालय का यतो धर्मस्ततो जय:, दूरदर्शन का सत्यं शिवम सुंदरम भी संस्कृत सुभाषित ही हैं। संविधान निर्माताओं द्वारा खुलकर अपनाए जाने के बावजूद आजाद भारत में संस्कृत की दशा सुधारने का कोई गंभीर प्रयास नहीं हुआ। आजादी के 68 साल बाद भी संस्कृत मृतप्राय भाषाओं में शामिल है। संस्कृत की इस दशा को बदलने के लिए अब एक नई जंग छिडऩे जा रही है। द्वारका व बद्रिकाश्रम पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती और उनके उत्तराधिकारी श्री विद्यापीठ केदारघाट वाराणसी के स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अब 'संस्कृत हमारी भाषाÓ मुहिम चलाने जा रहे हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का कहना था कि आजादी के बाद हुई जनगणना में संस्कृत बोलने वालों की संख्या लाखों में थी।

2011 की जनगणना में यह महज 14 हजार के आसपास बची है। संस्कृत की इस दशा को बदलने की जरूरत है। इसके लिए सरकार के साथ ही समाज को भी जगाना पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि यह अजीब विरोधाभास है कि हम हमारे सारे प्रमुख कार्यो जिसमें जन्म, मृत्यु, शादी, तीज त्योहारों के पूजन आदि सभी कुछ शामिल है, संस्कृत भाषा का ही इस्तेमाल करते हैं। रोज अपने ईश्वर से संवाद भी संस्कृत में ही करते हैं। इसके बाद भी संस्कृत जानने और बोलने से इंकार करते हैं। इस इंकार के चलते संस्कृत का दर्जा घटता जा रहा है। समाज का दबाव न होने की वजह से सरकारें भी संस्कृत को वह मान नहीं दे रहीं जिसकी यह प्राचीनतम भाषा हकदार है। अगली जनगणना में सभी हिन्दी, भोजपुरी, अवधी, गुजराती, तमिल की जगह संस्कृत को अपनी भाषा बताएं, इसकी मुहिम चलाई जाएगी। साथ ही इस बार की जनगणना के आंकड़ों में सुधार के लिए धर्माचार्य देश भर में लोगों से शपथपत्र भरवाकर जनगणना निदेशालय को भेजेंगे। जिससे कि सरकार संस्कृत की दशा सुधारने की दिशा में पहल करने को बाध्य हो सके।

Edited By: Preeti jha