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नवरात्र 'कन्या भोज' में बटुक को शामिल करने की परंपरा क्या है, जानिए इसके पीछे का धार्मिक रहस्य और महत्व

Published: Fri, 16 Oct 2026 04:47 PM (IST)

नवरात्र में 9 कन्याओं के साथ एक बटुक को भोजन कराने की परंपरा क्यों है जरूरी? बटुक किस भगवान का ...और पढ़ें

नवरात्र कन्या भोज में बटुक को क्यों खिलाया जाता है भोजन?  (Picture Credit- AI Generated)

नवरात्र कन्या भोज में बटुक को क्यों खिलाया जाता है भोजन? (Picture Credit- AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। नवरात्र का पर्व माता दुर्गा की आराधना और शक्ति की उपासना का पावन अवसर होता है। इन नौ दिनों में भक्त माता रानी के नौ स्वरूपों की पूजा करते हैं। वहीं दूसरी तरफ नवरात्र की अष्टमी और नवमी तिथि पर कन्या पूजन का भी विशेष महत्व होता है। इस दिन छोटी-छोटी कन्याओं को माता दुर्गा का स्वरूप मानकर उनके पैर धोए जाते हैं, तिलक लगाया जाता है और उन्हें भोजन कराया जाता है।

लेकिन क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि कन्या भोज के दौरान कई घरों में कन्याओं के साथ एक छोटे बालक को भी भोजन कराया जाता है? इस बालक को बटुक या लंगूर कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस बालक को भगवान बटुक भैरव का स्वरूप माना जाता है। चलिए नवरात्र में कन्‍या भोज के वक्‍त बटुक भोज के महत्‍व को विस्‍तार से एस्‍ट्रोपत्री के ज्‍योतिषी

बटुक किस भगवान का स्वरूप माने जाते हैं?

हिंदू धार्मिक परंपरा में बटुक को भगवान भैरव का बाल रूप माना जाता है। भगवान भैरव को भगवान शिव का एक शक्तिशाली स्वरूप माना गया है। उन्हें धर्म की रक्षा करने वाला, नकारात्मक शक्तियों से बचाने वाला और भक्तों की रक्षा करने वाला देवता माना जाता है। इसी कारण नवरात्र में कन्या पूजन के समय एक छोटे बालक को बटुक भैरव का प्रतीक मानकर भोजन कराने की परंपरा है।

कन्या भोज में बटुक को भोजन क्यों कराया जाता है?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता दुर्गा और भगवान भैरव की उपासना का आपस में विशेष संबंध है। भगवान भैरव को देवी के शक्तिपीठों का रक्षक माना जाता है। इसलिए कई भक्त माता रानी की पूजा के साथ भैरव बाबा की आराधना भी करते हैं। कन्या भोज में बटुक को भोजन कराने के पीछे मुख्य रूप से तीन मान्यताएं प्रचलित हैं। पहली मान्यता है पूजा की पूर्णता। दूसरी मान्यता है रक्षा और आशीर्वाद। तीसरी मान्यता है शक्ति और शिव का सम्मान।

क्या बटुक को भोजन कराना अनिवार्य है?

ऐसा नहीं है। यह एक परंपरा है। कई स्‍थानों पर आज भी केवल 9 कन्‍याओं को ही भोजन कराया जाता है। बटुक भैरव के रूप में कोई बालक मिल जाए तो सही है, नहीं है तो इससे माता की पूजा को अधूरा नहीं माना जाता है।

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