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युद्ध से ठीक पहले मंदोदरी ने दी थी यह सलाह! न मानकर रावण ने खुद लिखी अपनी मृत्यु की पटकथा

Published: Wed, 14 Oct 2026 04:00 PM (IST)

रामायण में युद्ध से ठीक पहले मंदोदरी ने रावण को श्री राम से युद्ध न करने की सलाह दी थी, ...और पढ़ें

रावण ने क्यों ठुकराई थी मंदोदरी की युद्ध टालने की सलाह (Picture Credit: AI Generated)

रावण ने क्यों ठुकराई थी मंदोदरी की युद्ध टालने की सलाह (Picture Credit: AI Generated)

HighLights

  1. मंदोदरी ने रावण को श्री राम से युद्ध टालने को कहा।

  2. रावण ने अपनी शक्ति के अभिमान में सलाह को ठुकराया।

  3. यह प्रसंग रामचरित मानस के लंकाकांड में वर्णित है।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। रामायण ग्रंथ में ऐसे कई प्रसंगों का वर्णन देखने को मिलता है जिससे लोग आज भी अनजान हैं। ज्यादातर लोगों को यह पता है कि प्रभु श्री राम और रावण के युद्ध में विजय सत्य की हुई और रावण का विनाश हुआ। वहीं लोग राम और रावण के युद्ध से पहले होने वाले कई प्रसंगों को नहीं जानते हैं।

एक ऐसा ही प्रसंग आता है लंकाकांड की चौपाइयों में जिसमें रावण की पत्नी मंदोदरी उन्हें कुछ सलाह दे रही हैं और रावण उनकी बात न मानकर भी युद्ध के लिए तैयार है, जिसकी वजह से अंत में रावण को राम के हाथों मृत्यु मिलती है।

मंदोदरी रावण की पटरानी थीं और हमेशा उनके हित के बारे में ही सोचती थीं। यही नहीं वो स्वभाव से अत्यंत धार्मिक भी थीं और इस बात के पक्ष में नहीं थीं कि यह युद्ध हो। आइए आपको बताते हैं रामायण के उस रोचक प्रसंग के बारे में जो मंदोदरी की विवशता और रावण के अभिमान को दिखाता है।

रामायण की इन चौपाइयों में छिपी है मंदोदरी की सलाह

यह चौपाइयां तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरित मानस में आती है। इसमें मंदोदरी और रावण के संवाद को दिखाया गया है।

चौपाई- कंत समुझि मन तजहु कुमतिही। सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही॥
रामानुज लघु रेख खचाई। सोउ नहिं नाघेहु असि मनुसाई॥1॥

चौपाई का अर्थ- हे कान्त! मन में विचार करके कुबुद्धि को छोड़ दो। आपका और श्री रघुनाथजी का युद्ध शोभा नहीं देता। उनके छोटे भाई ने एक जरा सी रेखा खींची थी, उसे भी आप नहीं लांघ सके थे, ऐसा आपका पुरुषत्व है॥1॥

चौपाई- पिय तुम्ह ताहि जितब संग्रामा। जाके दूत केर यह कामा॥
कौतुक सिंधु नाघि तव लंका। आयउ कपि केहरी असंका॥2॥

रखवारे हति बिपिन उजारा। देखत तोहि अच्छ तेहिं मारा॥
जारि सकल पुर कीन्हेसि छारा। कहाँ रहा बल गर्ब तुम्हारा॥3॥

चौपाई का अर्थ- हे प्रियतम! आप उन्हें संग्राम में जीत पाएंगे, जिनके दूतों ने ही यह काम कर दिखाया है? कौतूहल में ही इतने विशाल समुद्र को लांघकर वह वानरों में सिंह के सामान हनुमान आपकी लंका में निर्भय चला आया।

रखवालों को मारकर उसने अशोक वन को उजाड़ डाला। आपके देखते-देखते उसने अक्षयकुमार को मार डाला और संपूर्ण नगर को जलाकर राख कर दिया। उस समय आपके बल का गर्व कहां चला गया था?

चौपाई- अब पति मृषा गाल जनि मारहु। मोर कहा कछु हृदयँ बिचारहु॥
पति रघुपतिहि नृपति जनि मानहु। अग जग नाथ अतुलबल जानहु॥4॥

चौपाई का अर्थ- अब हे स्वामी! व्यर्थ ही अपनी डींगें न मारें, मेरे कहने पर हृदय में कुछ विचार करें। हे पति! आप श्री रघुपति को साधारण राजा मत समझिए, बल्कि उन्हें चराचर के स्वामी और अतुलनीय बलवान्‌ मानिए ॥4॥

मंदोदरी की सलाह पर रावण ने क्या किया?

मंदोदरी की इस सलाह पर कि रावण श्री राम से युद्ध न करे, रावण मुस्कुराते हुए वहां से चला गया और अभिमान से सिंघासन पर जा बैठा। इस प्रसंग के लिए भी कुछ चौपाइयां राम चरित मानस के लंकाकाण्ड में मिलती हैं-

चौपाई- तब रावन मयसुता उठाई। कहै लाग खल निज प्रभुताई॥
सुनु तैं प्रिया बृथा भय माना। जग जोधा को मोहि समाना॥1॥

चौपाई का अर्थ- तब रावण ने मंदोदरी को उठाया और वह दुष्ट उससे अपनी प्रभुता बताने लगा- हे प्रिये! सुन, तूने व्यर्थ ही भय मान रखा है। बता तो जगत्‌ में मेरे समान योद्धा कौन है?

चौपाई-बरुन कुबेर पवन जम काला। भुज बल जितेउँ सकल दिगपाला॥
देव दनुज नर सब बस मोरें। कवन हेतु उपजा भय तोरें॥2॥

चौपाई का अर्थ- वरुण, कुबेर, पवन, यमराज आदि सभी दिक्पालों को तथा काल को भी मैंने अपनी भुजाओं के बल से जीत लिया है। देवता, दानव और मनुष्य सभी मेरे वश में हैं। फिर तुझको यह भय किस कारण उत्पन्न हो गया?

चौपाई-नाना बिधि तेहि कहेसि बुझाई। सभाँ बहोरि बैठ सो जाई॥
मंदोदरीं हृदयँ अस जाना। काल बस्य उपजा अभिमाना॥3॥

चौपाई का अर्थ- मंदोदरी ने उसे बहुत तरह से समझाकर कहा और वह फिर सभा में जाकर बैठ गया। मंदोदरी ने हृदय में ऐसा जान लिया कि काल के वश में होने की वजह से उसके पति को अभिमान हो गया है॥

रामचरित मानस की ये सभी चौपोाइयां मंदोदरी और रावण के उस संवाद को दिखाती हैं, जिनमें पत्नी मंदोदरी अपने पति लंकापति रावण को मृत्यु से बचाने का प्रयास कर रही हैं।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।