देवाधिदेव महादेव ने सृष्टि के कल्याण के लिए अमृत बांटा और स्वयं विष पी लिया। ‘भोले भंडारी’ के नयनाभिराम रूप में वे सदैव हिमाच्छादित कैलाश पर ध्यानावस्था में विराजते हैं। जब आवश्यकता पड़ी, तो प्राणियों के कल्याण में सन्नद्ध हो गए। वे औघड़दानी कहलाते हैं। भक्तों के लिए सर्वसुलभ। उनकी कोई विशेष पूजा पद्धति नहीं है। जिसने भी विशुद्ध भक्ति भाव से भज लिया, उसी के हो गए।

‘समुद्र मंथन’ के समय कई अद्भुत वस्तुएं निकलीं। जब हलाहल निकला, तो कौन उसको छूने की भी आकांक्षा रखता? यह विष सृष्टि का समूल नाश कर देगा! यह भय संपूर्ण जगत में व्याप्त हो उठा। महादेव बिना एक क्षण गंवाए विष कुंभ को उठाकर पी गए। विष को अपने कंठ में ही रोक लिया। वह उनके शरीर को दग्ध नहीं कर सका, क्योंकि वे महायोगी हैं। वे जानते हैं कि कैसे, किसको कहां रोक लेना है। सारी सृष्टि कृतज्ञ भाव से ‘भगवान नीलकंठ की जय’ का उद्घोष कर उठी। महादेव का ‘नीलकंठ’ हो जाना, समूची मानवता के लिए एक सीख है। हम विचार करें। हर दिन हम दूसरे लोगों के अपने प्रति कुविचारों का न जाने कितना विष अपने भीतर समा लेते हैं। किसी ने हमारे बारे में कुछ कहा नहीं कि बस वह हमारे कंठ को पार करता हुआ हमारे शरीर के पोर-पोर में समा जाता है। हमारा मन जल उठता है। क्रोधाग्नि हमारे शरीर को नष्ट कर देती है।

हम आराधना तो ‘नीलकंठ’ की करते हैं, लेकिन अभी तक हमें उनके जैसा होना नहीं आया। यदि कोई आपके बारे में अनर्गल प्रलाप कर रहा है, तो क्यों उसे अपने हृदय तक जाने देते हैं? रोक लें उसे कंठ में। शब्द कहने वाले पर ही प्रभाव डालता है। इसलिए यदि कोई आपको अपशब्द कह रहा है, तो वही दुष्प्रभावित होगा। अपने विरुद्ध हो रही किसी भी बुराई को समाधिस्थ भाव से अपने कानों से आगे मत बढ़ने दीजिए। यही है महादेव की सच्ची

आराधना। इस महाशिवरात्रि अपने आराध्य के समक्ष प्रण कीजिए कि आप भी नीलकंठ बनने का प्रयास करेंगे।

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