Maa Siddhidatri Katha: मां दुर्गा का आखिरी स्वरूप सिद्धिदात्री हैं। ये मां दुर्गाजी की नौवीं शक्ति हैं। मां सिद्धिदात्री व्यक्ति को सिद्धि प्रदान करती हैं। अगर इनकी पूजी विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ की जाए तो व्यक्ति सभी सिद्धियों की प्राप्ति होती है। साथ ही ब्रह्मांड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की हिम्मत भी व्यक्ति में आ जाता है। देवीपुराण में कहा गया है कि मां सिद्धिदात्री की कृपा से ही शिवशंकर ने सिद्धियां प्राप्त की थीं। ये मां की ही अनुकम्पा थी कि भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ। इन्हें अर्द्धनारीश्वर कहा गया। 

मां सिद्धिदात्री के कई नाम हैं। इनमें अणिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, वाशित्व, सर्वकामावसायिता, सर्वज्ञत्व, दूरश्रवण, परकायप्रवेशन, वाक्‌सिद्धि, कल्पवृक्षत्व, सृष्टि, संहारकरणसामर्थ्य, अमरत्व, सर्वन्यायकत्व, भावना और सिद्धि शामिल हैं। कमल पुषअप पर आसीन मां की 4 भुजाएं हैं। मां का वाहन सिंह है। सिद्धिदात्री मां की आराधना-उपासना कर भक्तों की लौकिक, पारलौकिक सभी तरह की मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। मां अपने भक्तों की हर इच्छा पूरी करती हैं जिससे कुछ भी ऐसा शेष नहीं बचता है जिसे व्यक्ति पूरा करना चाहे। व्यक्ति अपनी सभी सांसारिक इच्छाओं, आवश्यकताओं से ऊपर उठता है और मां भगवती के दिव्य लोकों में विचरण करता हुआ उनके कृपा-रस-पीयूष का निरंतर पान करता है और फिर विषय-भोग-शून्य हो जाता है। इन सभी को पाने के बाद व्यक्ति को किसी भी चीज को पाने की इच्छान नहीं रह जाती है।

मां की आराधना से जातक को अणिमा, लधिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, सर्वकामावसायिता, दूर श्रवण, परकामा प्रवेश, वाकसिद्ध, अमरत्व भावना सिद्धि आदि समस्त सिद्धियों नव निधियों की प्राप्ति होती है। हालांकि, देखा जाए तो आज के जमाने में इतना कठोर तप कोई नहीं कर पाता है। लेकिन अगर व्यक्ति अपनी शक्तिनुसार जप, तप, पूजा-अर्चना करें तो मां की कृपा उस पर बनी रहती है। मां की कृपा पाने के लिए नवरात्रि में नवमी के दिन इसका जाप करना चाहिए।

या देवी सर्वभू‍तेषु मां सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

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