नहीं भूलता 1977 कुंभ का वह दिन
मैं भूल नहीं पाता 1977 कुंभ पर्व को। इस पर्व के मुख्य स्नान की पूर्व रात्रि में पतित पावनी मां गंगा अपने गोद में लाखों यात्रियों को समेटे थी। मेले में शिविरों, रैन बसेरों व खुले मैदान में लाखों यात्री भयंकर ठंड होने के बावजूद मौजूद थे।
मैं भूल नहीं पाता 1977 कुंभ पर्व को। इस पर्व के मुख्य स्नान की पूर्व रात्रि में पतित पावनी मां गंगा अपने गोद में लाखों यात्रियों को समेटे थी। मेले में शिविरों, रैन बसेरों व खुले मैदान में लाखों यात्री भयंकर ठंड होने के बावजूद मौजूद थे। इनको सुविधा पूर्वक मां गंगा का दर्शन व स्नान कराने के लिए प्रशासन स्वयंसेवी संस्थाएं व अन्य विभागों के सहयोग से कटिबद्ध दिख रहा था। पूर्व संध्या से ही आकाश में सभी देवी देवताओं के साथ इंद्र देवता भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे लेकिन इसके बावजूद रात्रि दो बजे से ही श्रद्धालुओं का रेला गंगा मैया की जय का उद्घोष करते हुए उनके दर्शन व स्नान को आतुर होकर आगे बढ़ रहा था। इधर सुबह अखाड़ों का शाही स्नान प्रारंभ हुआ और जैसे ही जूना अखाड़ा संगम तट पर पहुंचा आठ बजे इंद्र देवता ने प्रत्यक्ष रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी। वर्षा व श्रद्धालु जनता के बीच रस्साकशी चलने लगी। श्रद्धालु पीछे हटने को तैयार नहीं थे। हालांकि ठंड भी काफी हो गई थी लेकिन सबसे भयानक मंजर वर्षा के कारण हुई फिसलन व कीचड़ थी जिसमें लोग गिरकर चुटहिल हो रहे थे। सामान छूट रहा था। जूते-चप्पल छूटे जा रहे थे। कुछ बुजुर्गो के चश्मे आदि भी गिर गए, जो वे उठाने की हिम्मत नहीं कर सके। इसी में कुछ लोग अपने परिजनों से बिछुड़ गए। भूले-भटके शिविर में सैकड़ों लोग की भीड़ लग गई। शिविर के अंदर और बाहर लोग भीगते हुए खड़े थे। वृद्ध महिलाएं जो अपना नाम नहीं बता पा रही थी उनके संभालने में दिक्कत आ रही थी। कोई अपने पति का नाम बता रही थी। कहां-कहां कौन आया है, यह किसी की समझ में नहीं आ रहा था। कुछ महिलाएं अपने हाथ में अपने पति का नाम गोदवाएं थी वह उसे दिखाकर उन्हें खोजे जाने का आग्रह कर रही थीं। बड़ा मार्मिक दृश्य था। अफरातफरी मची थी। जो बिछुड़ गए थे वे रो रहे थे। जो अपनों को खोजने आए वे भी रो रहे थे। कुछ ठंड में थर-थर कांप रहे थे। आज की तरह संचार की समुचित व्यवस्था नहीं होने के कारण भी स्थिति बहुत खराब हो गई थी। भूले भटके शिविर में आज की तरह अच्छी व्यवस्था भी नहीं थी। अग्रवाल सेवा समिति के प्रबंध मंत्री की हैसियत से मैं उस मंजर को देख नहीं पा रहा था। लगातार स्वयंसेवक छड़ी डंडे व अन्य साधनों के द्वारा यात्रियों को शिविर में ला रहे थे। उनको भोजन व चिकित्सा आदि की व्यवस्था करने के बाद सबको गंतव्य की ओर भेजने का प्रबंध किया गया। प्रशासन ने भी फिसलन व कीचड़ वाले क्षेत्र से बाहर निकालने के प्रबंध किए। उनको शहर के विद्यालय धर्मशालाओं में ठहरने की व्यवस्था कराई। कुछ लोगों को टिकट आदि की व्यवस्था करके भी गंतव्य स्थान की ओर भेजा गया। गंगा मैया के आशीर्वाद से कोई मृत्यु सरीखी घटना नहीं हुई। हालांकि उस कुंभ में बारिश के कारण मेले की शोभा काफी बिगड़ गई थी। लेकिन कल्पवास और अखाड़े उसी प्रकार जमे रहे। संगम तट पर ऐसा कभी नहीं लगा कि बारिश की वजह से कोई फर्क पड़ा। वैसे पूरे कुंभ के दौरान बारिश की छाया और प्रभाव हावी रहा। मेले की व्यवस्था बिगड़ी तो संभलने में समय लग गया। जो स्नान करने आया था उसकी यादों में यह आज भी वह दृश्य समाया होगा। वैसे अब बारिश का प्रभाव कुंभ पर्व पर नहीं पड़ सकता है क्योंकि आज की तरह उस समय टेंट वाटरप्रूफ नहीं बनते थे। न ऐसे काठ के कॉटजे संत महात्मा बनवाते थे। कपड़े के टेंट और उसी को आकर्षक रूप प्रदान कर दिया जाता था। अब मेले का स्वरूप काफी परिवर्तित हो गया है। इसकी वजह भौतिकता का हावी होना है। यदि अब बारिश हो जाए तो मेला प्रशासन के पास इतने उपकरण है कि उसे सब कुछ व्यवस्थित करने में कुछ ही समय लगेगा। अब प्रचार के साधन बढ़ने से लोग कहां जाएं, इसे लेकर भ्रम में हैं। उस समय सिर्फ देवरहा बाबा का नाम था। हर व्यक्ति उन्हीं के आश्रम की ओर भागा चला जाता था। उनके दर्शन के लिए लोग घंटों टकटकी लगाए खड़े रहते थे। उनकी आशीर्वचन को सुनना लोग अपना भाग्य समझते थे। उसमें कौन बड़ा, कौन छोटे का भाव नहीं था। सब एक समान थे। ऐसे संतों की कमी आ गई है। मेले से काफी दिन से जुड़ा होने के कारण उनकी समझ में आया है कि यहां आने वाला कल्पवासी शायद बड़ा संत है।
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