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    इस जन्माष्टमी पर जाने गीता के श्लोकों में छुपे जीवन के कुछ रहस्य

    By Molly SethEdited By:
    Updated: Mon, 03 Sep 2018 11:32 AM (IST)

    युद्घ से विरत हो रहे महावीर अर्जुन को प्रेरित करने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने जो ज्ञान दिया वो गीता में संकलित है। जन्माष्टमी के अवसर पर जाने उनमें से कुछ श्लोक का अर्थ आैर मर्म।

    इस जन्माष्टमी पर जाने गीता के श्लोकों में छुपे जीवन के कुछ रहस्य

     श्री कृष्ण की वाणी में जीवन का सार है गीता 

    श्रीमद भगवत गीता वो ग्रंथ है जिसमें महाभारत के युद्घ के दौरान दिए श्री कृष्ण के उपदेश संकलित हैं। ये ज्ञान श्री कृष्ण ने तृतीय पाण्डव, आैर महान योद्घा अर्जुन को तब दिया था जब वे अपने शत्रु पक्ष में सारे प्रियजनों आैर परिजनों को देख कर विचलित हो गए थे। उन्होंने अपना गांडीव नाम का धनुष रख दिया था आैर युद्घ से विरत हो गए थे। कुरुक्षेत्र के मैदान पर सामने शत्रु की अपार सेना आैर अर्जुन का मोह देख कर कृष्ण ने जो कुछ उन्हें प्रेरित करने के लिए कहा वो केवल कोर्इ आेज पूर्ण वाक्य ही नहीं थे बल्कि उसमें समाजिक आैर नैतिक जीव का सारा ज्ञान समाहित था। नीचे दिए गए कुछ श्लोकों आइये उसमें से थोड़ा ज्ञान आत्मसात करें।     

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    पहला श्लोक

    योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय, सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।

    इसका अर्थ है हे अर्जुन सफलता और असफलता की आसक्ति को त्यागकर सम्पूर्ण भाव से समभाव होकर अपने कर्म को करो। यही समता की भावना योग कहलाती है। यानि अगर हम ये ही सोचते रहे कि कहीं हम नाकामयाब हो गए तो जीवन में कुछ भी नया करने का साहस ही नहीं करेंगे जो विकास के सारे मार्ग बंद कर देगा।  

    दूसरा श्लोक

    दुरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धञ्जय, बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः।

    इसका अर्थ है कि हे पार्थ अपनी बुद्धि, योग और चैतन्य द्वारा निंदनीय कर्मों से दूर रहो और समभाव से भगवान की शरण को प्राप्त हो जाओ। जो व्यक्ति अपने सकर्मों के फल भोगने के अभिलाषी होते हैं वह कंजूस  या लालची हैं। यानि अपने कार्यों की उपलब्धियों का सर्वोत्म फल पाने की कामना करना आैर इसके बाद विनम्रता का आचरण ना करना सामाजिकता नहीं हैं।  

    तीसरा श्लोक

    कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः, जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्।

    इसका अर्थ है कि हे अर्जुन, ईश्वरभक्ति में स्वयं को लीन करके बड़े बड़े ऋषि व मुनि खुद को इस भौतिक संसार के कर्म और फल के बंधनों से मुक्त कर लेते हैं| इस तरह उन्हें जीवन और मरण के बंधनो से भी मुक्ति मिल जाती है। ऐसे व्यक्ति ईश्वर के पास जाकर उस अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं जो समस्त दुःखों से परे है। यहां पर मोह आैर आसक्ति से बचने का संदेश दिया गया जो वास्तव में दुख का कारण बनते हैं। 

    चौथा श्लोक

    यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति, तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च।

    इस श्लोक में श्री कृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन जब तुम्हारी बुद्धि इस मोहमाया के घने जंगल को पार कर जाएगी तब सुना हुआ या सुनने योग्य सब कुछ से तुम विरक्त हो जाओगे। यहां अफवाहों, मिथ्या मान्यताआें, आैर रूढ़िवादिता से दूर रहने का संदेश दिया गया है। 

    पांचवा श्लोक

    श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्र्चला, समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि।

    इसका अर्थ कि हे पार्थ, जब तुम्हारा मन कर्मों के फलों से प्रभावित हुए बिना और वेदों के ज्ञान से विचलित हुए बिना आत्मसाक्षात्कार की समाधि में स्थिर हो जायेगा तब तुम्हें दिव्य चेतना की प्राप्ति हो जायेगी। यहां पर कोर्इ भी र्निणय लेने के पहले स्थिर मन से विचार करने का संदेश दिया गया है।  

    छठा श्लोक

    प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् , आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते।

    इसका अर्थ है कि हे पार्थ, जब कोई मानव समस्त इन्द्रियों की कामनाओं को त्यागकर उनपर विजय प्राप्त कर लेता है। जब इस तरह विशुद्ध होकर मनुष्य का मन आत्मा में संतोष की प्राप्ति कर लेता है तब उसे विशुद्ध दिव्य चेतना की प्राप्ति हो जाती है। यानि सफलताके लिए पहले खुद को स्थिर, तत्पर आैर लालच से दूर करना होता है। 

    सातवां श्लोक

    पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः, वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च।

    इस श्लोक में श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि इस समस्त संसार को धारण करने वाला, समस्त कर्मों का फल देने वाला, माता, पिता, या पितामह, ओंकार, जानने योग्य और ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद सब मैं ही हूं। यहां दायित्व से भागने के बारे में नहीं बल्कि उततरदायी होने के बारे में कहा गया है यानि शुभ अशुभ कर्मों को कराने वाला र्इश्वर है अत: आगे बढ़ कर जवाबदेही के भय से दूर सही काम करें।