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'कैला देवी के भवन में घुटुमन खेले लांगुरिया…' भजन में कौन हैं लांगुरिया? कैला मैया से क्या है उनका खास रिश्ता?

Published: Sat, 17 Oct 2026 12:00 PM (IST)

शारदीय नवरात्र में 'कैला देवी के भवन में घुटुमन खेले लांगुरिया' भजन का विशेष महत्व है, जिसके बिना माता रानी का कीर्तन अधूरा माना जाता है।

'घुटुमन खेले लांगुरिया' भजन का क्या है मतलब? (Picture Credit- AI Generated)

'घुटुमन खेले लांगुरिया' भजन का क्या है मतलब? (Picture Credit- AI Generated)

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संक्षेप में पढ़ें

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। शारदीय नवरात्र का पावन पर्व चल रहा है। इस अवधि के दौरान मां दुर्गा के 9 स्वरूपों की पूजा-अर्चना अलग-अलग दिन की जाती है। देवी के नौ रूपों की उपासना के साथ-साथ भगवत कीर्तन और माता की चौकी या जगराते का विशेष महत्व है। इस दौरान अधिकतर जगहों पर मां दुर्गा के कीर्तन देखने को मिलते हैं।

वैसे तो कीर्तन में देवी के कई सुंदर भजन सुनने को मिलते हैं, लेकिन एक ऐसा भजन है, जिसके बिना माता रानी का कीर्तन अधूरा माना जाता है। इस बात को जानकर आपके मन में सवाल आ रहा होगा कि आखिर वो कौन-सा भजन इतना महत्वपूर्ण है, जिसके बिना कीर्तन अधूरा रहता है। ऐसे में आइए इस आर्टिकल में आपको विस्तार से इसके बारे में बताते हैं।

बेहद प्यरा है यह भजन

"कैला देवी के भवन में घुटुमन खेले लांगुरिया..." यह प्यारा भजन माता रानी के कीर्तनों में बहुत सुनने को मिलता है। इस भजन का संबंध कैला देवी और हनुमान जी से है।

क्या है भजन का अर्थ 

लांगुरिया का अर्थ वानर है। यह भगवान हनुमान जी के वानर स्वरूप का प्रतीक है। लोक आस्था के अनुसार, हनुमान जी को प्यार से लांगुरिया भी कहा जाता है।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कैला देवी को माता भवानी का अवतार माना जाता है। लोक मान्यताओं के अनुसार, हनुमान जी कैला देवी के परम भक्त और द्वारपाल हैं।

इस भजन में 'घुटुमन खेले' का अर्थ है घुटनों के बल चलना या खेलना। इस शब्द के द्वारा इसमें यह बताया गया है कि बाल स्वरूप हनुमान जी कैला देवी के भवन में एक छोटे बच्चे की तरह घुटनों के बल खेल रहे हैं।

राजस्थान में है कैला देवी मंदिर

कैला देवी को समर्पित मंदिर राजस्थान के करौली जिले में है। इस मंदिर में हनुमान जी की प्रतिमा भी है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, लांगुरिया के दर्शन किए बिना कैला देवी के दर्शन अधूरे माने जाते हैं। इसलिए करौली मंदिर में हनुमान जी के दर्शन जरूर करने चाहिए।

चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान कीर्तन में माता रानी के भजनों के साथ लांगुरिया भजनों का गायन जरूर किया जाता है। इसके बिना देवी का कीर्तन अधूरा माना जाता है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।