सिर्फ छठ ही नहीं जितिया में भी है नहाय-खाय की परंपरा, दोनों में क्या अंतर और समानताएं हैं?
बिहार और पूर्वांचल में छठ की तरह जितिया व्रत में भी 'नहाय-खाय' की परंपरा बहुत प्रचलित है। लेकिन, कुछ लोग ...और पढ़ें

छठ और जितिया के नियमों में कितना अंतक? (AI-generated image)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। बिहार, झारखंड और यूपी के पूर्वांचल क्षेत्र में जब भी किसी कठिन व्रत की बात आती है तो छठ का नाम सबसे पहले आता है। लेकिन, बहुत लोग यह नहीं जानते कि संतान की लंबी उम्र और खुशहाली के लिए रखा जाने वाला व्रत 'जिउतिया' या 'जितिया' (जीवितपुत्रिका) भी नहाय-खाय से ही शुरू होता है।
दोनों ही त्योहार अपनी सर्वोच्च पवित्रता, कड़े नियमों और लोक-संस्कृति के लिए जाने जाते हैं। आइए इन दोनों महा-पर्वों के नहाय-खाय परंपरा में क्या समानताएं और अंतर है इस आर्टिकल में पढ़ते हैं।
नहाय-खाय की 3 समानताएं
- इन दोनों ही व्रतों में नहाय-खाय का मुख्य उद्देश्य व्रत रखने वाली माता (व्रती) के शरीर और मन को पवित्र करना होता है। इस दिन तड़के पवित्र नदी, तालाब या घर पर ही गंगाजल मिलाकर स्नान करने के बाद ही भोजन बनाया जाता है।
- दोनों ही पर्वों के नहाय-खाय वाले दिन लहसुन-प्याज से पूरी तरह परहेज करते हैं और सात्विक भोजन करने की परंपरा है। इसमें शुद्ध घी और सेंधा नमक का ही इस्तेमाल किया जाता है।
- दोनों ही व्रत में नहाय-खाय के अगले दिन से शुरू होने वाले 24 से 36 घंटे के लंबे निर्जला उपवास के लिए शरीर को ऊर्जा देने और तैयार करने के उद्देश्य से यह भोजन किया जाता है।
यहां पढ़ें दोनों पर्वों के नियमों में अंतर
- छठ पूजा के नहाय-खाय में कद्दू (लौकी) की सब्जी, अरवा चावल और चने की दाल मुख्य रूप से खाई जाती है। वहीं, जितिया के नहाय-खाय में नोनी का साग, मड़ुआ यानी रागी के आटे की रोटी, सतपुतिया (झिंगनी) की सब्जी और कई क्षेत्रों में ओठगन के तहत विशेष पारंपरिक चीजें खाने का नियम है।
- छठ पर्व भगवान सूर्य और छठी मैया की उपासना का पर्व है। जबकि, जितिया व्रत में गंधर्व राजकुमार भगवान जीमूतवाहन की पूजा की जाती है और चील-सियारिन की कथा सुनी जाती है।
- छठ पूजा चार दिनों का महापर्व होता है (नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और ऊषा (सुबह) अर्घ्य)। वहीं, जितिया तीन दिनों का अनुष्ठान है (नहाय-खाय, निर्जला व्रत का दिन और पारण)।
त्याग का पर्व
जितिया और छठ, दोनों ही पर्व माताओं के त्याग, अटूट विश्वास और पारिवारिक कल्याण के प्रतीक माने गए हैं। नहाय-खाय भले ही दोनों व्रतों की एक जैसी शुरुआत हो, लेकिन खान-पान का स्वाद और धार्मिक कथाएं इन दोनों को अपनी-अपनी जगह बेहद पावन बनाती हैं।
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