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जितिया 2026: बिना पानी की एक बूंद पिए संतान के लिए मां का कठिन तप, क्या है इस निर्जला व्रत का महत्व?

Published: Tue, 22 Sep 2026 08:00 AM (IST)

जितिया यानी जीवित्पुत्रिका व्रत माताएं अपनी संतान की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए रखती हैं। आइए जानते हैं ...और पढ़ें

जितिया व्रत का महत्व (AI-Generated Image)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में माताएं तमाम तरह के व्रत रखती हैं लेकिन, जितिया (जीवित्पुत्रिका) व्रत का अपना एक बेहद खास महत्व है। ये व्रत मुख्य रूप से यूपी, बिहार और झारखंड में मनाया जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखती हैं। यह एक बेहद कठिन निर्जला व्रत है, जिसमें पूरे दिन अन्न और जल का त्याग किया जाता है।

क्या है जितिया व्रत और इसका महत्व?

आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाने वाला यह व्रत माताओं के असीम प्रेम और त्याग का प्रतीक माना जाता है। पहले के समय में यह व्रत ज्यादातर पुत्रों के लिए रखा जाता था, लेकिन आज माताएं अपने सभी संतान चाहे वो लड़का हो या लड़की सबकी सलामती के लिए रखती हैं। इस दिन मुख्य रूप से गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन (Jimutavahana) की पूजा का विधान है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जीमूतवाहन ने एक नागिन के बच्चे के प्राण बचाने के लिए खुद को गरुड़ के सामने भोजन के रूप में सौंप दिया था। उनकी यह कथा हमें निस्वार्थ भाव और करुणा को सीख देती है।

जितिया व्रत 2026 की तिथियां

नहाय-खाय (2 अक्टूबर, शुक्रवार): घर की साफ-सफाई, शुद्धि स्नान और सात्विक भोजन करने का दिन।

मुख्य व्रत (3 अक्टूबर, शनिवार): आश्विन कृष्ण अष्टमी को सभी माताएं निर्जला उपवास रखेंगी और पूजा और कथा करेंगी।

पारण (4 अक्टूबर, रविवार): सूर्योदय के बाद स्थानीय समय के अनुसार व्रती अपना निर्जला व्रत खोलेंगी।

संतान प्राप्ति और कष्ट दूर करने के उपाय

मान्यता के अनुसार, जीमूतवाहन की पूजा करने से बच्चों पर आने वाले सभी संकट टल जाते हैं।

  • पीपल में त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का वास माना जाता है। इसके नीचे बैठकर कथा सुनने और पेड़ की परिक्रमा करने से दुख दूर होने की मान्यता है।
  • व्रत के दिन भोलेनाथ और माता पार्वती का अभिषेक करने से संतान प्राप्ति की मनोकामना पूरी होती है।
  • व्रत के पारण के बाद ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को भोजन व वस्त्र दान करने से पितरों का आशीर्वाद मिलता है।

पूजा विधि और सामग्री

जितिया की पूजा सामग्री हर जगह की परंपरा के अनुसार थोड़ी अलग-अलग हो सकती है। आमतौर पर इसमें पूजा की चौकी, दीया, कुमकुम, अक्षत, कलश, लाल-पीला धागा (जितिया) और मौसमी फलों का इस्तेमाल होता है।

व्रत की शुरुआत 'नहाय-खाय' से होती है। इसके अगले दिन मुख्य व्रत वाले दिन सुबह नहाकर संकल्प लें। शांत मन से पूजा करें और जीमूतवाहन की कथा जरूर पढ़ें। इसके बिना व्रत अधूरा माना जाता है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।