निर्जला व्रत से लेकर सोलह श्रृंगार तक: जानें क्यों खास है यूपी-बिहार की हरतालिका तीज?
उत्तर प्रदेश और बिहार में हरतालिका तीज का त्योहार भगवान शिव और देवी पार्वती की भक्ति को समर्पित एक अनूठी ...और पढ़ें

हरतालिका तीज परंपराएं उत्तर प्रदेश बिहार (Picture Credits- AI Images)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भारत भर में तीज का त्योहार अलग-अलग तरीके से मनाई जाती है, लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार में मनाई जाने वाली तीज की परंपरा का अपना अलग ही अंदाज है। इन राज्यों के कई हिस्सों में महिलाएं हरियाली तीज के बजाय हरतालिका तीज मनाती हैं।
यह दिन भी भगवान शिव और देवी पार्वती की भक्ति, व्रत, पूजा और पारंपरिक उत्सव को समर्पित है। सोलह श्रृंगार से लेकर खास मिठाइयां बनाने तक हर रीति-रिवाज का उत्सव को एक नया रंग देता है।
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उत्तर प्रदेश और बिहार में हरतालिका तीज खास
उत्तर प्रदेश और बिहार के कई हिस्सों में हरतालिका तीज महिलाओं के त्योहार में खास स्थान रखती है। हरियाली तीज के विपरीत यहां मुख्य ध्यान भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा पर केंद्रित होता है।
शादीशुदा महिलाएं व्रत रखती हैं और अपने पतियों के कल्याण और लंबी उम्र के लिए भगवान शिव से प्रार्थना करती हैं। यह पर्व देवी पार्वती की भगवान शिव के प्रति भक्ति का प्रतीक है, क्योंकि रीति-रिवाज एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में अलग होते हैं, इसलिए अनुष्ठान परिवारों और समुदायों के बीच अलग हो सकते हैं।
उपवास को माना जाता है पवित्र
हरतालिका तीज से जुड़ी सबसे मुश्किल परंपराओं में व्रत शामिल है। कई परिवारों में शादीशुदा महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं, जिसका मतलब है कि वे निर्धारित अवधि के लिए भोजन और पानी दोनों से परहेज करती हैं।
यह व्रत वैवाहिक सुख की कामना से किया जाता है। हालांकि व्रत रखने के तरीके अलग-अलग हिस्सों में रीति-रिवाज के आधार पर भिन्न हो सकते हैं।

सोलह श्रृंगार का महत्व
हरतालिका तीज पर जैसे-जैसे शाम ढलती है, कई महिलाएं पारंपरिक वस्त्र पहन और सोलह श्रृंगार करके पूजा-अर्चना की तैयारी करती हैं।
इस दौरान साड़ियां, चूड़ियां, गहने, मेहंदी और अन्य पारंपरिक वस्तुएं उत्सव के परिधान का अहम हिस्सा बन जाती है। कई समुदायों में यह श्रृंगार वैवाहिक जीवन और सुखमय गृहस्थी के आशीर्वाद से जोड़कर देखा जाता है।
तीज कथा जो सबको साथ लाती है
हरतालिका तीज के सबसे जरूरी पलों में से एक वह समय होता है जब महिलाएं तीज कथा सुनने के लिए इक्ट्ठा होती हैं। दिन भर व्रत रखने और पूजा की तैयारी करने के बाद शाम होते ही सामूहिक भक्ति शुरू हो जाती है।
इस दौरान महिलाएं एक साथ बैठती हैं और देवी पार्वती और भगवान शिव से जुड़ी पारंपरिक कथा सुनाती हैं। गांव की बुजुर्ग महिलाएं आमतौर पर युवा पीढ़ी के साथ रीति-रिवाज और कहानियों को साझा करती हैं।

गुझिया और खजूर का महत्व
हर भारतीय त्योहार में भोजन सबसे महत्वपूर्ण चीज होती है और हरतालिका तीज पर भी भोजन का विशेष महत्व देखने को मिलता है।
उत्तर प्रदेश और बिहार के कई हिस्सों में त्योहार के आसपास घरों में गुजिया औक खजूर जैसी पारंपरिक मिठाइयां बनाई जाती हैं। कुछ घरों में भुने हुए चावल के आटे, घी और चीनी से एक पारंपरिक भोजन तैयार किया जाता है।
क्षेत्रीय रीति रिवाज तीज को अनोखा बनाते हैं
हरतालिक तीज के आकर्षक बने रहने का एक कारण यह है कि, हर परिवार इसे एक तरीके से नहीं मनाता है। रीति-रिवाज हर समुदाय और परिवार में अलग देखने को मिलते हैं। कुछ परिवारों में व्रत और शाम की पूजा पर अधिक फोकस किया जाता है। जबकि अन्य परंपरा में भोजन, दान, वस्त्र और मिलन समारोहों को काफी महत्व है।
इसलिए यह त्योहार कैलेंडर पर सिर्फ एक दिन से कहीं अधिक बन जाता है। यह एक जीवंत परंपरा का हिस्सा है। उत्तर प्रदेश और बिहार के कई परिवारों के लिए हरतालिका तीज इस बात का प्रतीक है कि जीवनशैली में बदलाव आने के बाद भी आस्था, रिश्ते और सांस्कृतिक स्मृतियां लोगों को एक साथ ले जा सकती हैं।
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