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    गुरु पूर्णिमा विशेष: अघोरपंथ का शंखनाद करने आए थे बाबा कीनाराम

    By Preeti jhaEdited By:
    Updated: Tue, 19 Jul 2016 01:06 PM (IST)

    कालूराम ने नदी मेें बह रही एक लाश को जीवित करने को कहा। इस पर बाबा कीनाराम ने लाश को अपनी तरफ खींचा और उस पर हाथ फेरकर जिंदा कर दिया ।

    आजमगढ़। तीन जनपद आजमगढ़, जौनपुर, गाजीपुर की सीमा पर स्थित बाबा कीनाराम का आश्रम कई मायने में अपनी पहचान समेटे हुए हैं। यहां 16वीं शताब्दी में बाबा कीनाराम आए थे और अघोर पंथ का शंखनाद किया। मेहनाजपुर क्षेत्र का भ्रमण करते हुए गांगी नदी के उस पार नायकडीह में वैष्णो आश्रम बनाया। यह वर्तमान समय में गाजीपुर जनपद में पड़ता है।

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    यहां दर्शनार्थियों का रेला लगा रहता है। बाबा कीनाराम का जन्म 1601 भाद्र कृष्ण पक्ष चतुर्दशी संवत 1658 में काशी क्षेत्र के रामगढ़ गांव में क्षत्रिय परिवार में हुआ था। इनके पिता अकबर सिंह थे। माता का नाम मनसा देवी व पत्नी का नाम कात्यायिनी देवी था। इनका निर्वाण 21 सितंबर 1771 में हुआ था। इनका पूरा जीवनकाल 170 वर्ष का रहा है। समाधि स्थान क्री कुंड शिवाला वाराणसी में है।

    धर्मशास्त्रों के अनुसार श्री नारायण (विष्णुजी) से आशीर्वाद प्राप्त कर विश्व भ्रमण विश्व कल्याण के लिए निकले बाबा का आगमन 1620 ई. में मेहनाजपुर क्षेत्र में आए और आश्रम के लिए एकांत स्थान की खोज करते गांगी नदी के पास पहुंचे। घनघोर जंगल, नदी का किनारा देखकर इन्होंने तय किया कि आश्रम के लिए यह स्थान उपयुक्त होगा। यहां साधकों को साधना करने के लिए उचित स्थान है। यह सोचकर बाबा कीनाराम नायकडीह में आश्रम बनाया।

    गाजीपुर में पड़ता है नायकडीह : बाबा का आश्रम नायकडीह थाना खानपुर जनपद गाजीपुर में पड़ता है। इस आश्रम के महंथ विजया राम नाम बालक को बनाकर अपने कार्यक्रम को आगे बढ़ाया। गिरनार हिमालय से अपने गुरू दत्तात्रेय की अनुमति लेकर कीनाराम चलने लगे तो दत्तात्रेय ने इन्हें अघोरपंथ के प्रमुख परिधान पहनाएं और इन्हें सोटा देकर विदा करते हुए कहा कि पूरे विश्व अघोरपंथ का प्रचार प्रसार कर शखंनाद करो, जीवन और जन कल्याण करते हुए धर्म की स्थापना करो।

    दत्तात्रेय ने दिया कीनाराम को सुझाव : दत्तात्रेय ने कहा कि औघड़ का एक प्रमुख पात्र होता है जो कालूराम के पास है। वह तुम्हें काशी में मणिकर्णिका घाट पर गंगा के किनारे मिलेंगे। उनसे वह खप्पर मांग लेगा। बाबा भ्रमण करते हुए काशी के मणिकर्णिका घाट गंगा किनारे पहुंचे तो वहां उन्हें कालूराम मिले और एक नर कंकाल को चना खिला रहे थे। बाबा ने अपने तप बल के प्रभाव से उन कंकाल को चना खाने से रोका और कालू राम के सामने प्रस्तुत हुए। उन्होंने अपना संक्षिप्त परिचय दिया। कालूराम ने नदी मेें बह रही एक लाश को जीवित करने को कहा। इस पर बाबा कीनाराम ने लाश को अपनी तरफ खींचा और उस पर हाथ फेरकर जिंदा कर दिया और उसका नाम राम जियावन रख दिया। बाबा कीनाराम के प्रथम शिष्य राम जियावन ही हुए। इसके बाद कालूराम से खप्पड़ लेकर जन कल्याण के लिए निकल पड़े। बाबा कीनाराम के बारे में कहा जाता है कि उनके जीवन काल में कई आश्चर्यचकित कर देने वाली घटनाएं रही है। बाबा का नाम दूर-दूर तक विख्यात है। यहां लोगों का तांता लगा रहता है।