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आंखों में आंसू और चेहरे पर मुस्कान! क्या है मां दुर्गा को विदाई देने की 'देवी बरण' की अनूठी परंपरा?

Published: Mon, 19 Oct 2026 08:00 PM (IST)

शारदीय नवरात्र के दौरान विजयदशमी पर मां दुर्गा की विदाई से पहले 'देवी बरण' की विशेष रस्म निभाई जाती है। ...और पढ़ें

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HighLights

  1. विजयदशमी पर मां दुर्गा की विदाई से पहले 'देवी बरण' रस्म।

  2. सुहागिन महिलाएं सिंदूर, पान, मिठाई से करती हैं विदाई।

  3. मां दुर्गा को मायके से बेटी की तरह विदा किया जाता है।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। शारदीय नवरात्र के दौरान न सिर्फ बंगाल में बल्कि पूरे देश में दुर्गा पूजा का उत्सव मनाया जाता है। जिस तरह माता की प्रतिमा स्थापित करने को सबसे शुभ घड़ी माना जाता है वैसे ही विदाई का पल उतना ही भावुक कर देने वाला होता है।

मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल में विजयदशमी के दिन मां दुर्गा को विदा करने से पहले 'देवी बरण' की विशेष रस्म निभाई जाती है। इस दौरान महिलाओं के चेहरे पर मुस्कान होती है, लेकिन आंखें मां की विदाई के दुख में नम हो जाती हैं।

ऐसा माना जाता है कि माता दुर्गा की विदाई ठीक उसी तरह से होती है जैसे मायके से बेटी विदा होती है। आइए आपको बताते हैं क्या है देवी बरण की परंपरा और इसका धार्मिक महत्व क्या है?

क्या है देवी बरण की रस्म?

बंगाल की दुर्गा पूजा में देवी बरण एक महत्वपूर्ण पारंपरिक अनुष्ठान माना जाता है। दुर्गा पूजन के समापन के समय विजयदशमी के दिन इस रस्म को मां दुर्गा की विदाई से ठीक पहले किया जाता है। मान्यता है कि मां दुर्गा इन दिनों अपने मायके आई हुई बेटी की तरह भक्तों के बीच रहती हैं।

विजयदशमी पर उन्हें विदा करते समय सभी सुहागिन महिलाएं पूरे आदर, प्रेम और भावुकता के साथ उनकी विदाई की रस्म निभाती हैं। जिस तरह से बेटी की विदाई में मां रस्में निभाती है, ठीक उसी तरह से।

इस परंपरा सुहागिन महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर, पान, मिठाई और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करती हैं। मां के माथे और चरणों तक में सिंदूर लगाकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है और उसके बाद सभी एक-दूसरे को सिंदूर लगाते हैं।

देवी बरण कैसे किया जाता है?

देवी बरण की विधि अलग-अलग स्थानों पर अलग तरह से निभाई जाती है। आमतौर पर महिलाएं थाली में पान, सुपारी, मिठाई, सिंदूर और अन्य पारंपरिक सामग्री सजाकर मां दुर्गा के सामने पहुंचती हैं। वे देवी को भोग अर्पित करती हैं और उनकी आरती कर सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।

इसके बाद मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित किया जाता है। इस दौरान ढाक की गूंज, शंखनाद और मां के जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है। यही नहीं इस रस्म के दौरान माता के आंसू पान के पत्ते से पोंछे जाते हैं और ऐसा माना जाता है कि माता ससुराल जाते समय उदास न हों। इस रस्म के पूरा होने के बाद मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन विधि-विधान के साथ किया जाता है।

इस पूरी परंपरा का एक मान्यता यह है कि दुर्गा पूजा के दौरान माता दुर्गा यानी मां पार्वती पृथ्वी पर अपने मायके आती हैं और विसर्जन के समय वापस कैलाश पर्वत अपने ससुराल लौटती हैं। इसी वजह से माता की विदाई बेटी की तरह से की जाती है।

देवी बरण को मां दुर्गा के प्रति प्रेम, श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम माना जाता है। सुहागिन महिलाएं इस दिन अपने परिवार की सुख-शांति, वैवाहिक जीवन की खुशहाली और सौभाग्य की कामना करती हैं।

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