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दुर्गा पूजा की मूर्ति में मां की आंखें क्यों होती हैं खास? ‘चक्षुदान’ की इस परंपरा का रहस्य कर देगा हैरान

Published: Thu, 15 Oct 2026 01:00 PM (IST)

दुर्गा पंडाल में माता की मूर्तियों की खासियत उनकी आंखें होती हैं, जो भक्तों को सबसे ज्यादा आकर्षित करती हैं। ...और पढ़ें

मां दुर्गा पूजा की आंखों का रहस्य: 'चक्षुदान' परंपरा और इसका महत्व (Picture Credit: AI Generated)

मां दुर्गा पूजा की आंखों का रहस्य: 'चक्षुदान' परंपरा और इसका महत्व (Picture Credit: AI Generated)

HighLights

  1. दुर्गा पूजा में मां की आंखें सबसे आखिर में बनती हैं।

  2. बंगाल में इसे 'चक्षुदान' परंपरा कहा जाता है, जो महालय पर होती है।

  3. वरिष्ठ मूर्तिकार आंखों में करुणा, शक्ति और ममता का भाव भरते हैं।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। आपने अक्सर दुर्गा पंडालों में माता की आंखों को ओर गौर किया होगा, कुछ अलग और मानो भक्तों से बातें कर रही हों।

माता की आंखों की संरचना वास्तव में इतनी अनोखी होती है कि दर्शन के समय नजरें वहीं टिक जाती हैं। हर साल दुर्गा पूजा में मां दुर्गा की विशाल मूर्ति बनाई जाती है जिसमें माता के वस्त्र, आभूषण और अस्त्र-शस्त्र तक खूबसूरती से सजा दिए जाते हैं। वहीं एक चीज ऐसी होती है जिसे मूर्तिकार सबसे आखिर में बनाते हैं, वो हैं मां दुर्गा की आंखें।

वास्तव में थोड़ी अलग दिखने वाली माता की आंखों में ऐसा क्या होता है जो सबको आकर्षित करता है? यही नहीं बंगाल में माता दुर्गा की प्रतिमा बनाते समय एक ऐसी परंपरा निभाई जाती हैं जिसमें मूर्तिकार माता की आंखों में मानो प्राण डालता है, इसे चक्षुदान कहा जाता है। आखिर ऐसा क्या है इन आंखों के पीछे का रहस्य जिसे सदियों से बंगाल के मूर्तिकार संभाल कर रखते आए हैं?

माता दुर्गा की आंखों का रहस्य क्या है?

यह बंगाल की दुर्गा पूजा से जुड़ी एक खास परंपरा है जिसे चक्षुदान कहा जाता है। बंगाल के कुम्हार टोली जैसे प्रसिद्ध मूर्तिकार इलाकों में मिट्टी से माता दुर्गा की प्रतिमा बनाने का काम कई चरणों में पूरा है। इस दौरान सबसे पहले बांस और भूसे से ढांचा तैयार किया जाता है फिर उसके ऊपर मिट्टी की परतें चढ़ाई जाती हैं।

धीरे-धीरे मां का चेहरा हाथ, अस्त्र और पूरा स्वरूप तैयार किया जाता है। इसके बाद माता की मूर्ति में रंग, वस्त्र और आभूषण पहनाकर प्रतिमा को एक भव्य रूप दिया जाता है, लेकिन जब पूरी प्रतिमा तैयार हो जाती है उस समय भी मां की आंखें बनाने की अनोखी रस्म निभाई जाती है। माता की आंखें बनाते समय एक छोटी सी लकीर भी माता के चेहरे के पूरे भाव बदल देती है।

माता की आंखों का स्वरूप कैसा होता है?

जिस समय मूर्तिकार माता दुर्गा की आंखें बनाता है उनमें करुणा दिखनी चाहिए, शक्ति दिखाई देनी चाहिए और भक्तों को मां की ममता का एहसास भी होना चाहिए। इसीलिए यह काम अत्यंत कुशलता और एकाग्रता से किया जाता है। इस परंपरा का महत्व सिर्फ कला तक सीमित नहीं होता है बल्कि बंगाल में इसे चक्षुदान कहा जाता है।

चक्षु का अर्थ होता है आंख और दान का अर्थ है अर्पित करना। यह प्रथा सदियों से बंगाल की दुर्गा पूजा का अनूठा हिस्सा है और इसे मुख्य रूप से महालय के दिन किया जाता है।

क्या है चक्षुदान की परंपरा?

जब वह मां की आंखों में आखिरी रेखा खींचता है तो उसके लिए वह सिर्फ चित्रकारी का काम नहीं रह जाता। उसमें मूर्तिकार की मेहनत, पीढ़ियों से चली आ रही कला और मां के प्रति श्रद्धा भी दिखाई देने लगती है। माता दुर्गा की आंखें हमेशा सबसे वरिष्ठ कलाकार ही बनाता है जिससे उसमें जीवंतता आ जाए।

माता की आंखों को दुर्गा पूजा में स्थापना से पहले गुप्त रखा जाता है जिससे वह भक्तों के सामने जब आएं तब भक्त उनसे एक अनोखा रिश्ता कायम कर पाएं। इसी वजह से जब हम दुर्गा पूजा के पंडाल में मां की आंखों से नजर मिलाते हैं तब हमें सिर्फ मिट्टी और रंगों से बनी प्रतिमा नहीं दिखाई देती है बल्कि माता का एक जीवंत स्वरूप नजर आता है। माता की आंखों में हमें दिखाई देती है एक मां की शक्ति, मां की करुणा और भक्तों की रक्षा करने वाली देवी दुर्गा का स्वरूप।

आप भी जब पंडाल में माता दुर्गा के दर्शन करें माता की आंखों को एक बार रूककर जरूर देखें। माता की आंखों में आपको भी जरूर दिखेगा माता का आशीर्वाद।

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