श्रीराम का दशहरा या मां दुर्गा की विजयदशमी? पौराणिक कथाओं से समझें दोनों के बीच का अंतर
अक्सर दशहरा पर्व मनाने का कारण श्री राम की रावण पर विजय को माना जाता है, लेकिन क्या आप जानते ...और पढ़ें

दशहरा और विजयदशमी का वास्तविक अंतर: श्रीराम और मां दुर्गा की विजय गाथाएं (Picture Credit: AI Generated)
HighLights
विजयदशमी मां दुर्गा के महिषासुर वध की विजय का पर्व।
दशहरा भगवान श्रीराम द्वारा रावण पर विजय का प्रतीक।
शमी वृक्ष पूजा, पांडवों की विजय और स्वर्ण मुद्रा कथाएं।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि तिथि को मनाए जाने वाले पर्व को विजयदशमी और दशहरा कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन माता दुर्गा के कात्यायनी स्वरूप ने महिषासुर का वध किया था और भगवान श्रीराम ने रावण का वध करके विजय प्राप्त की थी।
आमतौर पर हम ऐसा मानते हैं कि दशहरा पर्व सिर्फ इसलिए मनाया जाता है क्योंकि इसी दिन प्रभु श्री राम ने रावण पर विजय प्राप्त की थी। यह भी समझा जाता है कि इसी का दूसरा नाम विजयदशमी भी है, लेकिन दोनों के बीच एक बड़ा अंतर है जिसे समझना जरूरी भी है।
हालांकि, दशहरा से जुड़ी अन्य पौराणिक और लोक कथाएं भी प्रचलित हैं जो दोनों पर्वों के बीच और इनके नामों के अंतर को बताती हैं। आइए जानते हैं इन पौराणिक कथाओं के बारे में।
महिषासुर मर्दिनी की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, महिषासुर रम्भासुर का पुत्र था और वो बेहद शक्तिशाली भी था। उसने कठिन तपस्या की और उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा।
महिषासुर ने उस समय वरदान मांगा कि देवता, असुर और मनुष्य में से कोई भी उसे मार न सके और उसकी मृत्यु केवल किसी स्त्री के हाथों हो। ब्रह्माजी ने उसे 'एवमस्तु' कहकर वरदान दे दिया।
वरदान मिलने के बाद महिषासुर ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया और त्रिलोकाधिपति बन गया। उसके अत्याचारों से परेशान होकर सभी देवताओं ने भगवती महाशक्ति की आराधना की।
मान्यता के अनुसार, सभी देवताओं के शरीर से निकला दिव्य तेज एक परम सुंदरी स्त्री के रूप में प्रकट हुआ। हिमवान ने देवी को सवारी के लिए सिंह दिया और देवताओं ने उन्हें अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए।
देवी ने महिषासुर के साथ नौ दिनों तक युद्ध किया और दसवें दिन उसका वध कर दिया। इसी विजय की स्मृति में विजयादशमी का पर्व मनाए जाने की मान्यता है।
महिषासुर को असुर अर्थात दैत्य माना जाता है, राक्षस नहीं। एक अन्य मान्यता के अनुसार, इसी दिन देवी सती अपने पिता दक्ष के यज्ञ में अग्नि में समा गई थीं। बाद में उन्होंने हिमवान के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया था।
राम-रावण युद्ध की कथा
अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र भगवान श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास मिला था। उनके साथ उनकी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण भी वन गए थे। वनवास के दौरान वे गोदावरी नदी के किनारे पंचवटी में कुटिया बनाकर रहने लगे।
मान्यता के अनुसार, इसी दौरान लंका के राजा रावण ने छल से माता सीता का अपहरण कर लिया। इसके बाद भगवान श्रीराम ने हनुमानजी, सुग्रीव, जामवंत और वानर सेना की सहायता से समुद्र पर सेतु बनाया और लंका पर चढ़ाई की।
श्रीराम और रावण के बीच कई दिनों तक युद्ध चला। अंत में भगवान श्रीराम ने दशमी तिथि को रावण का वध कर दिया। इसी घटना की स्मृति में दशहरा मनाए जाने की मान्यता है। इस दिन कई स्थानों पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है।
रावण को राक्षस माना जाता है, असुर नहीं।
पांडवों की विजय की कथा
एक मान्यता यह भी है कि विजयदशमी के दिन पांडवों ने कौरवों पर विजय प्राप्त की थी। हालांकि, इस मान्यता की ऐतिहासिक पुष्टि नहीं है।
प्रचलित कथा के अनुसार, अज्ञातवास समाप्त होने के बाद पांडवों ने शमी के वृक्ष में छिपाकर रखे अपने अस्त्र-शस्त्र दोबारा प्राप्त किए। इसके बाद उन्होंने विराट की गायों को ले जा रही कौरव सेना पर आक्रमण किया और विजय प्राप्त की।
इसी घटना को विजयादशमी से जोड़कर देखा जाता है। कई स्थानों पर इस दिन शमी के वृक्ष की पूजा करने की परंपरा भी है।
कुबेर और राजा रघु की कथा
एक पौराणिक मान्यता के अनुसार, दशहरे के दिन कुबेर ने राजा रघु को स्वर्ण मुद्राएं प्रदान की थीं। इसी कथा के कारण शमी के पत्तों को सोने का प्रतीक मानकर एक-दूसरे को देने की परंपरा भी बताई जाती है।
कथा के अनुसार, अयोध्या के राजा रघु ने विश्वजीत यज्ञ किया था। यज्ञ के बाद उन्होंने अपनी सारी संपत्ति दान कर दी और एक पर्णकुटी में रहने लगे।
इसी दौरान कौत्स नामक एक ब्राह्मण उनके पास पहुंचे। उन्होंने बताया कि उन्हें अपने गुरु को गुरुदक्षिणा देने के लिए 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राओं की आवश्यकता है।
राजा रघु ने कौत्स की सहायता के लिए कुबेर पर आक्रमण करने का निर्णय लिया। इससे भयभीत होकर कुबेर राजा रघु की शरण में आए और उन्होंने अश्मंतक तथा शमी के वृक्षों पर स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा कर दी।
कौत्स ने इनमें से केवल 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएं लीं। शेष स्वर्ण मुद्राएं राजा रघु ने लोगों में बांट दीं। इसी कथा से दशहरे पर एक-दूसरे को शमी के पत्ते 'सोने' के प्रतीक के रूप में देने की परंपरा जोड़ी जाती है।
शमी के पत्तों से जुड़ी एक अन्य लोककथा
एक अन्य लोककथा के अनुसार, एक राजा ने भगवान का मंदिर बनवाया और उसमें प्राण-प्रतिष्ठा के लिए एक ब्राह्मण को आमंत्रित किया। ब्राह्मण ने दक्षिणा में एक लाख स्वर्ण मुद्राएं मांग लीं। राजा इसके लिए चिंतित हो गया।
राजा ने ब्राह्मण से एक रात महल में रुकने और सुबह तक दक्षिणा की व्यवस्था करने का आग्रह किया। रात में चिंतित राजा को सपने में भगवान ने दर्शन दिए और शमी के पत्ते लाने को कहा। मान्यता के अनुसार, भगवान ने सपने में कहा कि वे शमी के पत्तों को स्वर्ण मुद्राओं में बदल देंगे।
सुबह राजा ने अपने सेवकों को शमी के पत्ते एकत्र करने के लिए भेजा। लोककथा के अनुसार, शमी के सभी पत्ते स्वर्ण में बदल गए। इसी मान्यता से दशहरे के दिन शमी के वृक्ष की पूजा और उसके पत्तों को शुभ मानने की परंपरा जुड़ी बताई जाती है।
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स्रोत: प्रचलित पौराणिक एवं लोक कथाएं तथा धार्मिक मान्यताएं।
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