वेश्यालय की मिट्टी के बिना क्यों नहीं बनती मां दुर्गा की प्रतिमा? सोच बदल देगा 'पुण्य माटी' की रस्म का यह सच
कोलकाता की दुर्गा पूजा में सबसे खास माना जाता है मां दुर्गा की प्रतिमा का निर्माण। इस मूर्ति को बनाने ...और पढ़ें

दुर्गा पूजा में सोनागाछी की मिट्टी का महत्व: 'पुण्य माटी' की अनूठी परंपरा (Picture Credit: AI Generated)
HighLights
दुर्गा प्रतिमा निर्माण में सोनागाछी की मिट्टी का उपयोग।
वेश्यालय की मिट्टी को 'पुण्य माटी' कहने का कारण।
इस परंपरा से जुड़ी पौराणिक कथाएं और मान्यताएं।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। दुर्गा पूजा का पर्व पश्चिमी बंगाल बल्कि पूरे देश में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। शारदीय नवरात्र के आखिरी के 6 दिन कोलकाता की हर गली को रोशन करते हैं और इस दौरान माता दुर्गा की भक्ति में लोग डूबे रहते हैं। बंगाल में चलने वाला यह छह दिवसीय पर्व न सिर्फ एक अवसर है बल्कि लाखों लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने का एक माध्यम भी है।
नवरात्र के छठे दिन से शुरू होकर विजयदशमी तक इस पर्व की धूम दिखाई देती है। इस साल दुर्गा पूजा का आरंभ 16 अक्टूबर से हो रहा है और पूरे बंगाल में इस समय वातावरण में भक्ति सराबोर है। बंगला की दुर्गा पूजा में सबसे खास मानी जाती है माता दुर्गा की मूर्ति और इससे जुड़े कई रहस्य।
वास्तव में इस मूर्ति का हर हिस्सा खास होता है और माता की आंखों में उनका जीवंत रूप साफ दिखाई देता है। माता दुर्गा की प्रतिमा में सबसे महत्वपूर्ण बात होती है कि उनकी मूर्ति के निर्माण के लिए कोलकाता के सोनागाछी यानी वेश्यालय की मिट्टी का इस्तेमाल किया जाता है। अक्सर लोगों के मन में इसको लेकर कई सवाल आते हैं। आइए आपको बताते इसके रहस्य के बारे में।
दुर्गा प्रतिमा के लिए क्यों जरूरी होती है वेश्यालय की मिट्टी?
कोलकाता की दुर्गा पूजा में माता दुर्गा की जिस प्रतिमा को स्थापित किया जाता है उसमें वेश्यालय की मिट्टी का इस्तेमाल जरूरी होता है। इसके पीछे एक सबसे बड़ी मान्यता यह है कि जैसे ही कोई व्यक्ति इस इस स्थान पर प्रवेश करता है उसकी पवित्रता वेश्यालय के द्वार पर ही छूट जाती है और उसके सभी अच्छे कर्म दहलीज के बाहर ही रह जाते हैं।
इसी वजह से उस स्थान की मिट्टी को पवित्रता का स्थान दिया गया है। इसके साथ ही, यह ऐसा स्थान होता है जहां रहने वाली वेश्याओं को समझ से बहिस्कृत किया गया है। ऐसे में उन्हें सामान दिलाने के लिए दुर्गा प्रतिमा में ही उस स्थान की मिट्टी के इस्तेमाल की परंपरा शुरू हुई। पश्चिम बंगाल में कोलकाता के सबसे बड़े रेड लाइट एरिया की मिट्टी से माता दुर्गा की मूर्तियों का निर्माण किया जाता है।
क्यों कहा जाता है इस मिट्टी को 'पुण्य माटी'?
सोनागाछी की मिट्टी को पुण्य माटी इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस मिट्टी से निर्मित प्रतिमा से भक्त जो भी मनोकामनाएं मांगते हैं वो अवश्य ही पूरी होती हैं।
यही नहीं मान्यता यह भी है कि यदि दुर्गा पूजा में इस स्थान की मिट्टी से प्रतिमा न बनाई जाए तो यह पूजन माता दुर्गा को स्वीकार्य नहीं होता है। इस माटी को सबसे ज्यादा पवित्र माना जाता है क्योंकि वेश्यालय में प्रवेश करने वाला अपने सारे पुण्य दरवाजे पर ही छोड़ देता है। इसी वजह से यह स्थान बहुत पवित्र बन जाता है।
कौन लाता है दुर्गा मूर्ति के निर्माण के लिए वेश्यालय से मिट्टी
मूर्ति के निर्माण के लिए स्वयं मंदिर के पुजारी या मूर्तिकार वेश्यालय से मिट्टी लाते हैं। यही नहीं यदि कोई मिट्टी देने से मना कर देता है तो वो तब तक उस स्थान से नहीं जाते हैं जब तक उन्हें वहां की मिट्टी न मिल जाए।
क्या है रामायण काल से जुड़ी कथा
इस परंपरा को लेकर एक कथा यह भी है कि रामायण काल में भगवान राम ने रावण के साथ युद्ध से पहले माता दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उनकी मूर्ति का निर्माण किया। उस समय रामचंद्र जी ने एक वेश्या अंबालिका के घर की दहलीज से ही यह मिट्टी ली थी। उसी समय से यह प्रथा आज भी चली आ रही है।
इस परंपरा से जुड़ी एक और पौराणिक कथा है, जिसके अनुसार, एक वेश्या माता दुर्गा की परम भक्त थी। समाज से तिरस्कृत होने की वजह से वह काफी दुखी थी और माता उसकी भक्ति से इतनी प्रसन्न हुईं कि उसे वरदान दिया और कहा कि उनकी प्रतिमा के लिए हमेशा वेश्यालय की मिट्टी का इस्तेमाल किया जाएगा।
यदि ऐसा नहीं किया गया तो मूर्ति में कभी भी माता दुर्गा का वास नहीं होगा। इसी वरदान की वजह से आज भी माता दुर्गा की प्रतिमा में वेश्यालय की मिट्टी का इस्तेमाल होता है।
वास्तव में यह एक अनोखी परंपरा है जो समाज के तिरस्कृत वर्ग को भी एक ऊंचा स्थान दिलाता है। माता दुर्गा का यह स्वरूप भी एक अलग पहचान दिखाता है।
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