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    दत्तात्रेय की पत्नी लक्ष्मी पुन: उनके पास पहुंच गईं

    By Preeti jhaEdited By:
    Updated: Mon, 03 Oct 2016 11:20 AM (IST)

    गर्ग ने बताया कि एक बार देवता गण दैत्यों से हारकर बृहस्पति की शरण में गए। बृहस्पति ने उन्हें गर्ग के पास भेज दिया।

    कृतवीर्य हैहयराज की मृत्यु के बाद उनके पुत्र अर्जुन का राज्याभिषेक होने का अवसर आया, तो उन्होंने राज्यभार ग्रहण करने के प्रति उदासीनता व्यक्त की। अर्जुन ने कहा कि प्रजा का हर व्यक्ति अपनी आय का बारहवां भाग इसलिए राजा को देता है, ताकि राजा उसकी सुरक्षा करे। अनेक बार ऐसा भी होता है कि प्रजा को अपनी सुरक्षा के लिए और उपायों का प्रयोग भी करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में राजा का पतन अवश्यंभावी है। ऐसे राज्य को ग्रहण करने से क्या लाभ? उनकी बात सुनकर मुनि गर्ग ने कहा, तुम्हें दत्तात्रेय का आश्रय लेनाचाहिए, क्योंकि स्वयं विष्णु ने उनके रूप में अवतार लिया है। गर्ग ने बताया कि एक बार देवता गण दैत्यों से हारकर बृहस्पति की शरण में गए।

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    बृहस्पति ने उन्हें गर्ग के पास भेज दिया। देवताओं ने गर्ग मुनि के कहने पर दत्तात्रेय के आश्रम में शरण ले ली।

    जब दैत्य आश्रम पहुंचे, तो वहां लक्ष्मी को आसीन देखकर उनके सौंदर्य पर आसक्त हो गए। युद्ध की

    बात भूलकर वे लोग लक्ष्मी को पालकी में बैठाकर चल दिए। ऐसा करने के कारण उनका तेज नष्ट हो

    गया। दत्तात्रेय की प्रेरणा से देवताओं ने युद्ध कर उन्हें हरा दिया। दत्तात्रेय की पत्नी लक्ष्मी पुन: उनके पास

    पहुंच गईं। अर्जुन ने जब दत्तात्रेय के प्रभाव वाली कथा सुनी, तो उनके आश्रम गए। अपनी सेवा से उन्हें प्रसन्न कर लिया। उन्होंने प्रजा का न्यायपूर्वक पालन करने का वर मांगा। साथ ही, उनसे यह वर भी प्राप्त किया कि जब वे कुमार्ग पर चलेंगे, तो उन्हें सदैव राह दिखाने वाले उपदेशक मिल जाएंगे। इसके बाद अर्जुन का राज्याभिषेक

    हुआ। उन्होंने चिरकाल तक न्यायपूर्वकराज्य-कार्य संपन्न किया। वर्षों बाद जब उन्हें अपनी वीरता पर अहंकार हो गया, तो उनकापतन हो गया।