बार-बार एक ही बात सोचकर हो रहे हैं परेशान? गीता का यह श्लोक शांत करेगा बेचैन मन
बार-बार एक ही बात सोचने से मन अशांत हो जाता है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने मन की चंचलता को शांत ...और पढ़ें

भगवद्गीता के श्लोक करेगें मन शांत। (Picture Credit- AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। आजकल कई लोग छोटी-छोटी बातों को लेकर घंटों सोचते रहते हैं। कभी बीते हुए समय की बातें मन को परेशान करती हैं, तो कभी भविष्य की चिंता बेचैनी बढ़ा देती है। कई बार हम किसी बात को बार-बार सोचते हैं, लेकिन कोई समाधान नहीं मिलता। इसके बजाय मन और अधिक थक जाता है। ऐसी स्थिति में भगवद्गीता की शिक्षाएं हमें मन को समझने और शांत करने का रास्ता दिखाती हैं।
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में मन की चंचलता और उसे नियंत्रित करने के उपाय बताए हैं। आइए जानते हैं वह कौन-सा श्लोक है, जो हमें बार-बार आने वाले विचारों से निपटने की प्रेरणा देता है।
भगवद्गीता का कौन-सा श्लोक मन को शांत करने की सीख देता है?
भगवद्गीता के छठे अध्याय के 35वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि मन को नियंत्रित करना कठिन जरूर है, लेकिन नियमित अभ्यास से इसे वश में किया जा सकता है।
श्लोक:
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥
श्लोक का सरल अर्थ क्या है?
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, हे अर्जुन! इसमें कोई संदेह नहीं कि मन बहुत चंचल है और इसे नियंत्रित करना बेहद कठिन है। लेकिन निरंतर अभ्यास और वैराग्य के माध्यम से मन को वश में किया जा सकता है।
इस श्लोक का संदेश है कि मन को शांत करना एक दिन का काम नहीं है। इसके लिए धैर्य, निरंतर प्रयास और विचारों के प्रति सही दृष्टिकोण जरूरी है। जब हम किसी बात को बार-बार सोचने लगते हैं, तो मन को धीरे-धीरे वर्तमान में वापस लाने का अभ्यास करना चाहिए।
ओवरथिंकिंग से बचने के लिए गीता की 3 सीख
- जब मन पुरानी घटनाओं या भविष्य की चिंताओं में उलझ जाए, तो खुद को वर्तमान में लाने का प्रयास करें। अपने आसपास की चीजों पर ध्यान दें या किसी जरूरी काम में मन लगाएं। शुरुआत में कठिनाई आएगी, लेकिन निराश होने के बजाय अपना ध्यान दोबारा वर्तमान पर लाएं।
- कई बार हम उन बातों को बदलने की कोशिश में परेशान रहते हैं, जो हमारे हाथ में नहीं होतीं। दूसरों की सोच, बीते हुए फैसले और भविष्य की हर परिस्थिति हमारे नियंत्रण में नहीं है। ऐसे में अपनी ऊर्जा उन कार्यों पर लगाएं, जिनमें आप कुछ सुधार कर सकते हैं। इसका अर्थ जिम्मेदारियों से भागना नहीं, बल्कि व्यर्थ की चिंता छोड़कर सही कदम उठाना है।
- जब मन में विचारों का सिलसिला तेज हो जाए, तो कुछ मिनट शांत बैठें। धीरे-धीरे सांस लें और छोड़ें। अपना ध्यान सांसों की गति पर केंद्रित करें। अगर मन भटकता है, तो बिना खुद को दोष दिए फिर से सांस पर ध्यान लगाएं। नियमित ध्यान से कुछ लोगों को तनाव कम करने और मन को स्थिर करने में मदद मिलती है।
अत: मन को शांत करने के लिए अभ्यास और धैर्य जरूरी हैं। भगवान श्रीकृष्ण की यह सीख याद दिलाती है कि निरंतर प्रयास से हम अपने विचारों के साथ बेहतर ढंग से जीना सीख सकते हैं और धीरे-धीरे मानसिक शांति की ओर बढ़ सकते हैं।
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